
कुगुरु: कुत्सिताचारः सशल्यः सपरिग्रह: ।
सम्यक्त्वेन व्रतेनापि युक्त: स्यात्सद्गुरुर्यत: ॥601॥
अत्रोदेशोऽपि न श्रेयान् सर्वतोऽतीव विस्तरात् ।
आदेयो विघिरत्रोक्तो नादेयोऽनुक्त एव सः ॥602॥
अन्वयार्थ : जिसका आचार कुत्सित है जो शल्य और परिग्रह सहित है वह कुगुरु है, क्योंकि सद्गुरु सम्यक्त्व और व्रत इन दोनों से युक्त होता है ॥६०१॥ इस विषय में भी अत्यन्त विस्तार से लिखना सर्वथा उचित नहीं है, क्योंकि जो विधि आदेय है वही यहाँ कही गई है और जो अनादेय है वह नही ही कही गई है ॥६०२॥