+ देव का स्वरूप -
दोषो रागादिसद्भाव: स्यादावरणं कर्म तत्‌ ।
तयोरभावोऽस्ती निःशेषो यत्रासौ देव उच्यते ॥603॥
अस्त्यत्र केवलं ज्ञानं क्षायिकं दर्शनं सुखम् ।
वीर्यं चेति सुविख्यातं स्यादनन्तचतुष्टयम् ॥604॥
एको देव: स सामान्याद्‌ द्विधावस्थाविशेषत: ।
संख्येया नामसंदर्भाद् गुणेभ्यः स्यादनन्तधा ॥604॥
एको देवः स द्रव्यार्थात्सिद्धः शुद्धोपलब्धितः ।
अर्हन्निति सिद्धश्च पर्यायार्थाद् द्विधा मतः ॥606॥
दिव्यौदारिकदेहस्थो धौतघातिचतुष्टयः ।
ज्ञानदृग्वीर्यसौख्याढ्य: सोऽर्हन् धर्मोपदेशकः ॥607॥
अन्वयार्थ : रागादि का पाया जाना, यह दोष है और ज्ञानावरणादि ये कर्म हैं; जिनके इन दोनों का सर्वथा अभाव हो गया है वह देव कहा जाता है ॥६०३॥ उसके केवल-ज्ञान , क्षायिक-दर्शन , क्षायिक-सुख और क्षायिक-वीर्य यह सुविख्यात अनन्त चतुष्टय होता है ॥६०४॥ द्रव्यार्थिक नय की अपेक्षा वह देव एक है, अवस्था विशेष की अपेक्षा दो प्रकार का है, संज्ञावाचक शब्दों की अपेक्षा संख्यात प्रकार का है और गुणों की अपेक्षा अनन्त प्रकार का है ॥६०५॥ शुद्धोपलब्धिरूप द्रव्यार्थिक नय की अपेक्षा से वह देव एक प्रकार का माना गया है और पर्यायार्थिक नय की अपेक्षा से अरहन्त और सिद्ध इस तरह दो प्रकार का माना गया है ॥६०६॥ जो दिव्य औदारिक देह में स्थित है; चारों घातिया कर्मों से रहित है; ज्ञान, दर्शन, वीर्य और सुख से परिपूर्ण है और धर्म का उपदेश देने वाला है वह अरिहंत देव है ॥६०७॥