ततः सिद्धमनायासात्तत्पदत्वं तयोरिह ।
नूनं बाह्योपयोगस्य नावकाशोऽस्ति तत्र यत्‌ ॥712॥
न पुनश्चरणं तत्र छेदोपस्थापनां वरम् ।
प्रागादाय क्षणं पश्चात्सूरिं: साधुपदं श्रयेत् ॥713॥
उक्तं दिङ्मात्रमत्रापि प्रसङ्गाद्गुरुलक्षणम्‌ ।
शेषं विशेषतो ज्ञेयं तत्स्वरूपं जिनागमात्‌ ॥714॥
अन्वयार्थ : इसलिये यह बात सिद्ध हुई कि आचार्य और उपाध्याय के श्रेणी आरोहण के समय साधु पद्‌ अनायास होता है क्‍योंकि वहां पर बाह्य उपयोग को कोई अवकाश नहीं है ॥७१२॥ किन्तु ऐसा नहीं है कि आचार्य पहले छेदोपस्थापनारूप उत्तम चारित्र को ग्रहण करके पश्चात्‌ साधुपद को धारण करता है ॥७१३॥ इस प्रकार यहां पर प्रसंगवश संक्षेप से गुरु का लक्षण कहा । उन का शेष स्वरूप विशेषरूप से जिनागम से जानना चाहिये ॥७१४॥