
नैवं हेतोरतिव्याप्तेरारादाक्षीणमोहिषु ।
बन्धस्य नित्यतापत्तेर्भवेन्मुक्तेरसम्भवः ॥707॥
ततोऽस्त्यन्तःकृतो भेद: शुद्धेर्नानांशतस्त्रिषु ।
निर्विशेषात्समस्त्वेष पक्षो माभूद्वहि: कृत:॥708॥
किञ्चास्ती यौगिकीरूढिः प्रसिद्वा परमागमे ।
विना साधुपदं न स्यात्केवलोत्पत्तिरञ्जसा ॥709॥
तत्र चोक्तमिदं सम्यक् साक्षात्सर्वार्थसाक्षिणा ।
क्षणमस्ति स्वत: श्रेण्यामधिरूढस्य तत्पदम् ॥710॥
यतोऽवश्यं स सूरिर्वा पाठकः श्रेण्यनेहसि ।
कृत्स्नचिन्तानिरोधात्मलक्षणं ध्यानमाश्रयेत् ॥711॥
अन्वयार्थ : ऐसा नहीं है, क्योंकि ऐसा मानने पर यह लक्षण क्षीण-मोही और उनके समीपवर्ती गुणस्थान वालों में अति-व्याप्त हो जाता है और यदि यहाँ भी इच्छापूर्वक क्रिया मानी जाती है तो बन्ध को नित्यता की आपत्ति प्राप्त होने से मुक्ति असम्भव हो जाती है ॥७०७॥ इसलिये 'विशुद्धि के नाना अंशो की अपेक्षा से अन्तरंगकृत भेद है' -- यह पक्ष सामान्य रूप से तीनों में माना जाना चाहिये । इसे बाह्य-क्रिया की अपेक्षा से मानना उचित नहीं है ॥७०८॥ दूसरे परमागम में जो यह सार्थक रूढि प्रसिद्ध है कि साधु पद को प्राप्त किये बिना नियम से केवलज्ञान की उत्पत्ति नहीं होती है ॥७०९॥ सो इस विषय में समस्त पदार्थों को साक्षात् जाननेवाले सर्वज्ञ देव ने यह ठीक ही कहा है कि श्रेणी पर चढ़े हुए जीव के वह साधु-पद क्षणमात्र में स्वतः प्राप्त हो जाता है ॥७१०॥ क्योंकि चाहे आचार्य हो या उपाध्याय श्रेणि पर चढ़ने के समय वह नियम से सम्पूर्ण चिन्ताओं के निरोध रूप ध्यान को धारण करता है ॥७११॥