
तत्र मूलगुणाश्चाष्टौ गृहिणां व्रतधारिणाम् ।
क्वचिदव्रतिनां यस्मात् सर्वसाधरणा इमे ॥723॥
निसर्गाद्वा कुलाम्नायादायातास्ते गुणाः स्फुटम् ।
तद्विना न व्रतं यावत्सम्यक्त्वं च तथाङ्गिनाम् ॥724॥
एतावता विनाप्येष श्रावको नास्ति नामतः ।
किं पुनः पाक्षिको गूढो नैष्ठिक: साधकोऽथवा ॥725॥
मद्यमांसमधुत्यागी त्यक्तोदुम्बरपञ्चक: ।
नामतः श्रावकः ख्यातो नान्यथापि तथा गृही ॥726॥
यथाशक्ति विधातव्यं गृहस्थैर्व्यसनोज्झनम् ।
अवश्यं तद्व्रतस्थैस्तैरिच्छद्भि: श्रेयसीं क्रियाम् ॥727॥
त्यजेद्दोपांस्तु तत्रोक्तान् सूत्रेऽतीचारसंज्ञकान् ।
अन्यथा मद्यमांसादीन् श्रावकः कः समाचरेत् ॥728॥
दानं चतुर्विधं देयं पात्रबुद्ध्याऽथ श्रद्धया ।
जघन्यमध्यमोत्कृष्टपात्रेभ्यः श्रावकोत्तमै: ॥729॥
अन्वयार्थ : उनमें से व्रतधारी ग्रहस्थों के आठ मूलगुण होते हैं । कहीं-कहीं ये अव्रतियों के भी होते हैं, क्योंकि ये सर्वसाधारण धर्म हैं ॥७२३॥ ये आठ मूलगुण स्वभाव से या कुलाम्नाय से पलते हुए चले आते हैं । इनके बिना जीवों के न तो व्रत ही होता है और न सम्यक्त्व ही होता है ॥७२४॥ इनके बिना जब यह जीव नाम से भी श्रावक नहीं हो सकता है तब फिर वह पाक्षिक, गूढ़, नैष्ठिक और साधक कैसे हो सकता है ॥७२५॥ जिसने मद्य, मांस और मधु का त्याग कर दिया है और जिसने पांच उदम्बर फलों को छोड़ दिया है, वह नाम से श्रावक कहलाता है । किन्तु जो मद्य, मांस आदि का त्यागी नहीं है वह नाम से भी गृहस्थ नहीं है ॥७२६॥ इसी प्रकार ग्रहस्थों को यथाशक्ति व्यसनों का त्याग करना चाहिये और कल्याणप्रद क्रियाओं को चाहने वाले व्रती ग्रहस्थों को तो उनका अवश्य ही त्याग करना चाहिये ॥७२७॥ तथा ग्रहस्थों को आगम में इनके अतीचार रूप जो दोष कहे गये हैं उनका भी त्याग कर देना चाहिये । इसके विपरीत ऐसा कौन श्रावक है जा मद्य, मांस आदि का सेवन करेगा ? ॥७२८॥ उत्तम श्रावकों को जधन्य, मध्यम और उत्कृष्ट पात्रों के लिए पात्र-शुद्धि और श्रद्धा-पूर्वक चार प्रकार का दान देना चाहिये ॥७२९॥