कुपात्रायाप्यपात्राय दानं देयं यथोचितम्‌ ।
पात्रबुद्ध्या निषिद्धं स्यान्निषिद्धं न कृपाधिया ॥730॥
शेषेभ्य: क्षुत्पिपासादिपीडितेभ्योऽशुभोदयात्‌ ।
दीनेभ्योऽभयदानादि दातव्यं करुणार्णवे: ॥731॥
पूजामप्यर्हतां कुर्याद्‌ यद्वा प्रतिमासु तद्धिया ।
स्वरव्यञ्जनानि संस्थाप्य सिद्धानप्यर्चयेत्सुधी: ॥732॥
सूर्युपाध्यायसाधूनां पुरस्तत्पदयो: स्तुतिम्‌ ।
प्राग्विधायाधा पूजां विदध्यात् त्रिशुद्धितः ॥733॥
सम्मानादि यथाशक्ति कर्तव्यं च सधर्मिणाम् ।
व्रतिनां चेतरेषाम्वा विशेषाद्-ब्रह्मचारिणाम्‌ ॥734॥
नारीभ्योऽपि व्रताढ्याभ्यो न निषिद्धं जिनागमे ।
देयं सम्मानदानादि लोकानामविरुद्धतः ॥735॥
जिनचैत्यगृहादीनां निर्माणे सावधानता ।
यथा सम्पद्विधेयास्ति दूष्या नाऽवद्यलेशतः ॥736॥
सिद्धानामर्हताश्चापि यन्त्राणि प्रतिमाः शुभाः ।
चैत्यालयेषु संस्थाप्य प्राक्-प्रतिष्ठापयेत् सुधी: ॥737॥
अपि तीर्थादियात्रासु विदध्यात्‌सोद्यतं मनः ।
श्रावकः स च तत्रापि संयमं न विराधयेत्‌ ॥738॥
अन्वयार्थ : कुपात्र और अपात्र के लिये भी यथायोग्य दान देना चाहिये । किन्तु इनके लिये पात्र-बुद्धि से दान का देना निषिद्ध है कृपा-बुद्धि से दान देना निषिद्ध नहीं है ॥७३०॥ इसी प्रकार दया सिन्धु श्रावकों को अशुभ-कर्म के उदय से क्षुधा, तृषा, आदि से दुःखी शेष दीन-प्राणियों को भी अभयदान आदि देना चाहिये ॥३३१॥ उत्तम बुद्धि वाला श्रावक अरहंतों की पूजन करे । अथवा अरहंत को बुद्धि से उनकी प्रतिमाओं की पूजन करे । और स्वर तथा व्यंजनों की स्थापना करके अर्थात सिद्ध-चक्र यन्त्र बना कर सिद्धों की भी पूजन करे ॥७३२॥ तथा वह आचार्य, उपाध्याय और साधुओं के आगे पहले मन, वचन और काय की शुद्धि-पूर्वक उनके चरणों की स्तुति करके फिर आठ प्रकार की पूजा करे ॥७३३॥ तथा वह व्रती या अव्रती सहधर्मी जनों का और विशेष रूप से ब्रह्मचारियों का यथा-शक्ति सम्मान आदि करे ॥७३४॥ इसी प्रकार जो नारियाँ व्रतों से परिपूर्ण हैं उनका भी जिनागम में सम्मान आदि करना निषिद्ध नहीं माना है । इसलिये लोक-व्यवहार के अनुकूल उनका भी सम्मान आदि करे ॥७३५॥ गृहस्थ को अपनी संपत्ति के अनुसार जिनमन्दिर आदि के निर्माण सें सावधानता रखनी चाहिये । यद्यपि इनके बनवाने में थोड़ा पाप लगता है पर वह निंध्य नहीं है ॥७३६॥ इसी प्रकार ज्ञानी श्रावक चैत्यालयों में सिद्धों के और अरहंतो के यंत्र और मनोहर प्रतिमाओं की स्थापना करके उनकी शीघ्र ही प्रतिष्ठा करा ले ॥३३७॥ तथा तीर्थयात्रादिक में अपने मन को सदा उद्यत रखे । और वह श्रावक वहां पर भी संयम की विराधना न करे ॥७३८॥