
नाप्यूहमिति शक्तिः स्याद्रागस्यैतावतोऽपि या ।
बन्धोत्कर्षोंदयांशानां हेतुर्द्दङ् मोहकर्मणः ॥916॥
एवं चेत् सम्यगुत्पत्तिर्न स्यात्स्याद् दृगसंभवः ।
सत्यां प्रध्वंससामग्र्यां कार्यध्वंसस्य सम्भवात् ॥917॥
न स्यात्सम्यक्त्व प्रध्वंसश्चारित्रावरणोदयात् ।
रागेणैतावता तत्र दृङ् मोहेऽनधिकारिणा ॥918॥
यतश्चास्त्यागमात्सिद्ध मेतद् दृङ् मोहकर्मणः ।
नियतं स्वोदयाद्वन्धप्रभृति न परोदयात् ॥919॥
अन्वयार्थ : यदि कोई ऐसा तर्क करे कि इस राग की यह शक्ति है कि वह दर्शनमोहनीय के बन्ध, उत्कर्ष, उदय और सत्व का कारण है सो उसका ऐसा तर्क करना भी ठीक नहीं है, क्योंकि ऐसा मानने पर सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति नहीं बन सकती है | फिर तो सम्यग्दर्शन का प्राप्त होना असम्भव हो जायगा, क्योंकि नाश की सामग्री रहने पर कार्य का नाश होना अवश्यंभावी है॥९१६-९१७॥ सच तो यह है कि चारित्रावरण कर्म के उदय से सम्यक्त्व का नाश नहीं होता है , क्योंकि यह राग दर्शनमोह के विषय में अनधिकारी है॥९१८॥ दूसरे आगम से भी यह बात सिद्ध है कि दर्शनमोहनीय कर्म के बन्ध आदि स्वोदय से ही होते हैं परोदय से नहीं होते ॥९१९॥