क्षायोपशमिकं ज्ञानं प्रत्यर्थं परिणामि यत्‌ ।
तत्सवरूपं न ज्ञानस्य किन्तु रागक्रियास्ति वै ॥903॥
प्रत्यर्थं परिणामित्वमर्थानामेतदस्ति यत्‌ ।
अर्थमर्थ परिज्ञानं मुह्यद्रज्यद् द्विषद्यथा ॥904॥
स्वसंवेदनप्रत्यक्षादस्ति सिद्धमिदं यतः ।
रागाक्तं ज्ञानमक्षान्तं रागिणो न तथा मुने: ॥905॥
अस्ति ज्ञानाविनाभूतो रागो बुद्धिपुरस्सरः ।
अज्ञातेऽर्थे यतो न स्याद्रागभावः खपुष्पवत्‌ ॥906॥
अस्त्युक्तलक्षणो रागाश्चारित्रावरणोदयात्‌ ।
अप्रमत्तगुणस्थानादर्वाक्‌ स्यान्नोर्ध्वमस्त्यसौ ॥907॥
अस्ति चोर्ध्वमसौ सूक्ष्मो रागश्चाबुद्धिपूर्वज: ।
अर्वाक् क्षीणकषायेभ्यः स्याद्विवक्षावशान्न वा ॥908॥
विमृश्यैतत्परं कैश्चिदसद्भूतोपचारतः ।
रागवज्ज्ञानमत्रास्ति सम्यक्त्वं तद्वदीरितम ॥909॥
हेतोः परं प्रसिद्धैर्यै: स्थूललक्ष्यैरिति स्मृतम्‌ ।
आप्रमत्तं च सम्यक्त्वं ज्ञानं वा सविकल्पकम्‌ ॥910॥
ततस्तूर्ध्वम् तु सम्यक्त्वं ज्ञानं वा निर्विकल्पकम् ।
शुक्लध्यानं तदेवास्ति तत्रास्ति ज्ञानचेतना ॥911॥
प्रमत्तानां विकल्पत्वान्न स्यात्सा शुद्धचेतना ।
अस्तीति वासनोन्मेषः केषाश्चित्स न सन्निह ॥912॥
यतः पराश्रितो दोषो गुणो वा नाश्रयेत्परम्‌ ।
परो वा नाश्रयेद्दोषं गुणं चापि पराश्रितम्‌ ॥913॥
पाकाच्चारित्रमोहस्य रागोऽस्त्यौदयिकः स्फुटम् ।
सम्यक्त्वे स कृतो न्यायाज्ज्ञाने वानुदयात्मके ॥914॥
अनिघ्नन्निह सम्यक्त्वं रागोऽयं बुद्धिपूर्वक: ।
नूतं हन्तुं क्षमो न स्याज्ज्ञानसन्चेतनामिमाम्‌ ॥915॥
अन्वयार्थ : क्षायोपशमिक ज्ञान एक एक पदार्थ के प्रति परिणमन करता है किन्तु यह ज्ञान का स्वरूप नहीं है। इसका कारण रागक्रिया है ॥९०३॥ जितने भी पदार्थ हैं उनमें से एक एक अर्थ के प्रति ज्ञान परिणमन करता है इसका यह अभिप्राय है कि ज्ञान एक एक पदार्थ के प्रति मोह करता है, राग करता है और द्वेष करता है ॥९०४॥ स्वसंवेदन प्रत्यक्ष से यह बात सिद्ध है, कि रागी पुरुष के जैसा रागयुक्त ज्ञान अक्षान्त होता है वैसा वीतराग मुनि के नहीं होता ॥९०५॥ बुद्धिपूर्वक राग ज्ञान का अविनाभावी है यह स्पष्ट ही है, क्योंकि अज्ञात अर्थ में आकाशफूल के समान रागभाव नहीं पाया जाता है ॥९०६॥ इस प्रकार पूर्वोक्त लक्षणवाला जो राग है वह चारित्रमोहनीय के उदय से अप्रमत्त गुणस्थान के पहले पहल तक ही पाया जाता है। इससे आगे के गुणस्थानों में नहीं पाया जाता ॥९०७॥ और ऊपर के गुणस्थानों में जो अबुद्धिपूर्वक सूक्ष्म राग होता है वह क्षीणकषाय गुणस्थान से पहले पहले ही होता है । फिर भी विवक्षावश वह है भी और नहीं भी है ॥९०८॥ केवल इसी बात का विचार करके किन्हीं आचार्यों ने उपचरितासद्भूत व्यवहार नय से उक्त गुणस्थानों में रागसहित ज्ञान को देखकर सम्यक्त्व को भी वैसा कहा है ॥९०९॥ केवल इसी हेतु से स्थूलदृष्टि वाले जिन आचार्यों ने ऐसा स्मरण किया है कि प्रमत्त संयत गुणस्थान तक सम्यक्त्व और ज्ञान सविकल्प हैं ॥९१०॥ तथा इससे आगे के गुणस्थानों में सम्यक्त्व और ज्ञान निर्विकल्प हैं। वही शुक्ल ध्यान है और वहीं पर ज्ञान चेतना होती है ॥९११॥ किन्तु प्रमत्त जीवों के विकल्प पाया जाता है इसलिये उनके वह शुद्धचेतना नहीं होती। उन आचार्यों के ऐसा वासनोन्मेष बना हुआ है पर वह ठीक नहीं है, क्योंकि दूसरी वस्तु में रहने वाला गुण और दोष किसी दूसरी वस्तु को नहीं प्राप्त होता और दूसरी वस्तु भी किसी दूसरी वस्तु में रहने वाले गुण और दोष को नहीं प्राप्त होती ॥९१२-९१३॥ यतः रागभाव चरित्रमोहनीय के उदय से होने के कारण स्पष्टत: औदयिक है अत: वह अनुदयरूप सम्यक्त्व और ज्ञान में किस न्याय से हो सकता है, अर्थात नहीं हो सकता ॥९१४॥ जब कि यह बुद्धिपूर्वक राग सम्यक्त्व का नाश नहीं करता तब फिर वह इस ज्ञान चेतना का नाश तो किसी भी हालत में नहीं कर सकता है ॥९१५॥