न प्रतीमो वयं चैतद् दृङ् मोहोपशमः स्वयम्‌ ।
हेतु: स्यात् स्वोदयस्योच्चैरुत्कर्षस्याथवा मनाक्‌ ॥921॥
नैवं यतोऽनभिज्ञोऽसि पुद्गलाचिन्त्यशक्तिषु ।
प्रतिकर्म प्रकृत्याद्यैर्नानारूपासु वस्तुतः ॥922॥
अस्त्युदयो यथानादेः स्वतश्चोपशमस्तथा ।
उदय: प्रशमो भूयः स्यादर्वागपुनर्भवात्‌॥923॥
अथ गत्यन्तराद्दोषः स्यादसिद्धत्वसंज्ञकः ।
दोषः स्यादनवस्थात्मा दुर्वारोऽन्योन्यसंश्रय:॥924॥।
दृङ् मोहस्योदयो नाम रागायत्तोऽस्ति चेन्मतम्‌ ।
सोऽपि रागोस्ति स्वायत्त: किं स्यादपररागसात्‌ ॥925॥
स्वायत्तश्चेच्च चारित्रस्य मोहस्योदयात्स्वतः ।
यथा रागस्तथा चायं स्वायत्तः स्वोदयात्स्वतः ॥926॥
अथ चेत्तद् द्वयोरेव सिद्धिश्चान्योन्यहेतुतः ।
न्यायादसिद्धदोषः स्याद्दोषादन्योन्यसंश्रयात्‌ ॥927॥
नागमः कश्चिदस्तीदृग्धेतुदृङ् मोहकर्मण: ।
रागस्तस्याथ रागस्य तस्य हेतुर्दृगावृतिः ॥928॥
तस्मात्सिद्धोऽस्ति सिद्धान्तो दृङ् मोहस्येतरस्य वा ।
उदयोऽनुदयो वाथ स्यादनन्यगतिः स्वतः ॥929॥
तस्मात्सम्यक्त्वमेकं स्यादर्थात्तल्लक्षणादपि ।
तद्यथावश्यकी तत्र विद्यते ज्ञानचेतना ॥930॥
अन्वयार्थ : ऐसा नहीं है, क्योंकि प्रत्येक कर्म की जो प्रकृति आदि रूप से नाना प्रकार की पुदगल की अचिन्त्य शक्तियां है उनके विषय में तुम वस्तुतः अनभिज्ञ हो ॥९२२॥ जिस प्रकार अनादि काल से कर्मों का उदय स्वयं हो रहा है उसी प्रकार उनका उपशम भी स्वयं होता है। इस प्रकार मोक्ष होने के पहले पहले ये उदय और उपशम बराबर होते रहते हैं ॥९२३॥ यदि ऐसा न मान कर स्वयं दर्शनमोहनीय के उपशम द्वारा सम्यक्त्व का घात स्वीकार किया जाय तो असिद्ध दोष आता है अनवस्था दोष आता है और अन्योन्याश्रय दोष आता है जो कि दुर्वार है ॥९२४॥ दर्शनमोहनीय का उदय यदि राग के आधीन माना जाय तो यह प्रश्न होता है कि वह राग भी स्वाधीन है या दूसरे राग के आधीन है ॥९२५॥ राग चारित्रमोहनीय के उदय से स्वतः होता है इसलिये स्वाधीन है यदि ऐसा माना जाय तो जिस प्रकार राग स्वयं होता है उसी प्रकार यह दर्शनमोह भी स्वाधीन है ऐसा क्‍यों नहीं माना जाता, क्‍योंकि यह भी स्वतः अपने उदय से होता है॥९२६॥ यदि कहा जाय कि इन दोनों की सिद्धि एक दूसरे के कारण होती है तो न्यायानुसार अन्योन्याश्रय दोष आता है जिससे किसी एक की भी सिद्धि नहीं हो सकती है । दोनों असिद्ध दोष के भागी हो जाते हैं ॥९२७॥ और ऐसा तो आगम भी नहीं बतलाता कि दर्शनमोहनीय का कारण राग है और राग का कारण दर्शन मोहनीय कर्म है ॥९२८॥ इसलिये यह सिद्धान्त निश्चित होता है कि चाहे दर्शनमोहनीय कर्म का उदय या अनुदय हो या चाहे अन्य कर्म का उदय या अनुदय हो, दूसरा कोई चारा न होने से होता है वह अपने आप ही ॥९२९॥ इसलिये सम्यक्त्व एक ही है । यह यों ही नहीं किन्तु वास्तव में अपने लक्षण के अनुसार भी वह एक ही है, अतः उसके सद्भाव में ज्ञान चेतना नियम से होती है ॥९३०॥