
मिश्रौपशमिकं नाम क्षायिकं चेति तत्त्रिधा ।
स्थितिबंधकृतो भेदो न भेदो रसबन्धसात् ॥931॥
तद्यथाऽथ चतुर्भेदो बन्धोऽनादिप्रमेदतः।
प्रकृतिश्च प्रदेशाख्यो बन्धौ स्थित्यनुभागकौ ॥932॥
प्रकृतिस्तत्स्वभावात्मा प्रदेशो देशसंश्रयः ।
अनुभागो रसो ज्ञेयो स्थितिः कालावधारणम् ॥933॥
स्वार्थक्रियासमर्थोऽत्र बन्धः स्याद्रससंज्ञिकः ।
शेषबन्धत्रिकोऽप्येष न कार्यकरणक्षम: ॥934॥
ततः स्थितिवशादेव सन्मात्रेऽप्यत्र संस्थिते ।
ज्ञानसंचेतनायास्तु क्षतिर्न स्यान्मनागपि ॥935॥
अन्वयार्थ : सम्यक्त्व के भेद और उनका कारण -
मिश्र औपशमिक और क्षायिक ये सम्यक्त्व के तीन भेद हैं । इनमें स्थिति-बन्धकृत ही भेद है रसबन्ध की अपेक्षा से भेद नहीं है॥९३१॥
विशेषार्थ- सम्यक्त्व के तीन भेद हैं- क्षायोपशमिक, औपशमिक और क्षायिक । क्षायोपशमिक सम्यक्त्व दर्शनमोहनीय के क्षयोपशम से होता है, औपशमिक सम्यक्त्व दर्शनमोहनीय के उपशम से होता है और क्षायिक सम्यक्त्व दर्शनमोहनीय के क्षय से होता है। दर्शनमोहनीय का अनुदय इन तीनों ही सम्यक्त्वों में पाया जाता है। कहीं पर वह क्षयोपशमरूप से पाया जाता है, कहीं पर उपशमरूप से और कहीं पर क्षय रूप से, इतना निश्चित है कि दर्शनमोहनीय के उदय से एक भी सम्यग्दर्शन नहीं होता। इसलिये सम्यक्त्व के ये भेद दर्शनमोहनीय की फ़लदान शक्ति की अपेक्षा से नहीं किये गये है । इन भेदों का यदि थोड़ा बहुत कारण कहा जा सकता है तो स्थितिबन्ध ही कहा जा सकता है। यहां स्थितिबन्ध से तात्पर्य सत्ता से है। दर्शनमोहनीय की सत्ता के सद्भाव और असद्भाव के कारण ही ये तीन भेद होते है यह उक्त कथन का तात्पर्य है। यद्यपि क्षायोपशमिक सम्यक्त्व में सम्यक् प्रकृति का उदय रहता है सही पर वह सम्यक्त्व की उत्पत्ति का कारण नहीं है, इसलिये अनुभाग शक्ति को तो किसी भी हालत में सम्यक्त्व के भेदों का कारण नहीं कहा जा सकता है॥९३१॥
बन्ध के चार भेद और उनका स्वरूप -
बन्ध के चार भेद हैं -प्रकृतिबन्ध, प्रदेशबन्ध, स्थितिबन्ध, और अनुभागबन्ध। - ये भेद अनादिकाल से चले आ रहे हैं॥९३२॥ जिसका जो स्वभाव है वह उसकी प्रकृति है। अवयवों के आधार से प्रदेश जानना चाहिये। रस को अनुभाग कहते हैं और काल का अवधारण करना स्थिति है॥९३३॥ इन चारों में एक मात्र अनुभागबन्ध ही अपने कार्य के करने में समर्थ है। इसके सिवा शेष तीन प्रकार का बन्ध कार्य करने में समर्थ नहीं है॥९३४॥ इसलिये इन सम्यग्दर्शनों में स्थितिवश दर्शनमोहनीय की सत्ता रहने पर भी ज्ञानचेतना की थोड़ी भी क्षति नहीं होती ।॥९३५॥
विशेषार्थ- आत्मा की राग, द्वेष रूप परिणतिवश प्रति समय कर्म वर्गणाओं का योग द्वारा ग्रहण होता रहता है। ये आत्मा से संश्लिष्ट होकर स्थित रहती है । इनमें उस उस समय के भावों के अनुसार जिस जिस प्रकार के कार्य के होने में निमित्त बनने की योग्यता हो जाती है वही उनकी संज्ञा होती है। जैसे ज्ञानावरण, दर्शनावरण आदि। इन सभी कर्मों की मुख्यतया चार अवस्थाएं होती हैं जिन्हें प्रकृति, स्थिति, अनुभाग और प्रदेश कहते हैं। कषाय से स्थिति और अनुभागबन्ध होता है और योग से प्रकृति और प्रदेशबन्ध होता है। ये कर्म बन्ध के चार भेद हैं। इनमें से जिस कर्म में जैसी फल दिलाने की शक्ति होती है उसके अनुसार वह कर्म जीव की अवस्था के होने में निमित्त होता है। मुख्य कार्यकारी फलदानशक्ति ही मानी गई है। उदय काल में इसी के अनुसार फल मिलता है। प्रकृति, स्थिति और प्रदेश ये कार्यकारी नहीं होते। आशय यह है कि कर्म की प्रकृति कोई रही आवे, स्थिति भी कितनी ही रहे आवे और प्रदेश भी कितने ही रहे आवें पर अनुभाग शक्ति उदय काल में जितनी और जैसी होगी उसी के अनुसार फल मिलेगा। स्थित अधिक है; प्रदेश अधिक हैं इसलिये फल अधिक मिलेगा और स्थित कम है, प्रदेश कम हैं, इसलिये फल कम मिलेगा ऐसा नहीं है। फल की व्याप्ति अनुभाग के साथ है इनके साथ नहीं इसलिये मुख्य रूप से अनुभागबन्ध ही कार्यकारी माना गया है। प्रकृति; स्थिति और प्रदेश हैं पर अनुभाग बदल गया तो वह फल नहीं मिलता, अन्य फल मिलता है। पर स्थिति और प्रदेशों के घट बढ़ जाने पर ऐसा नहीं होता । सब बन्धों में अनुभागवन्ध मुख्य है। कर्मों के सत्वकाल में रहते तो चारों बन्ध हैं पर उनका उदय न होने से वे अपना कार्य नहीं करते। इसी से सम्यग्दृष्टि के ज्ञानचेतना के होने में कर्मों को बाधक नहीं माना है यह उक्त कथन का तात्पर्य है ॥९३२-९३५॥