असंयतत्वमस्यास्ति भावोऽप्यौदयिको यतः ।
पाकाच्चारित्रमोहस्य कर्मणो लब्धजन्मवान्‌ ॥1113॥
संयमः क्रियया द्वेधा व्यासाद् द्वादशघाऽथवा ।
शुद्वस्वात्मोपलब्धिः स्यात्‌ संयमो निष्क्रियस्य च ॥1114॥
पंचानामिन्द्रियाणाञ्च मनसश्च निरोधनात्‌ ।
स्यादिन्द्रियनिरोधाख्य: संयम: प्रथमो मतः ॥1115॥
स्थावराणां च पञ्चानां त्रसस्यापि च रक्षणात ।
असुसंरक्षणाख्य: स्याद्‌ द्वितीय: प्राणसंयमः ॥1116॥
अन्वयार्थ : इस जीव के एक असंयत्व भाव होता है । वह औदायिक है, क्‍योंकि वह चारित्र-मोहनीय कर्म के उदय से उत्पन्न होता है ॥१११३॥ असंयतत्व भाव के भेद -- क्रिया की अपेक्षा संयम दो प्रकार का है और विस्तार से बारह प्रकार का है । किन्तु मूलतः आत्मा क्रिया-रहित है इसलिये उसकी अपेक्षा शुद्ध-आत्मस्वरूप की उपलब्धि ही संयम है ॥१११७॥ पांचों इन्द्रियाँ और मन का निरोध करने से इन्द्रिय-निरोध नाम का संयम होता है । यह संयम का पहला भेद माना गया है ॥१११५॥ पांचों स्थावर-काय और त्रस जीवों का संरक्षण करने से असुसंरक्षण नाम का संयम होता है । यह संयम का दूसरा भेद है । इसका दूसरा नाम प्राण-संयम भी है ॥१११६॥