
सत्यं चास्ति सुख जन्तोर्गुणो ज्ञानगुणादिवत् ।
भवेत्तद्वैतकृतं दुःखं हेतोः कर्माष्टकोदयात् ॥1107॥
अस्ति शक्तिश्च सर्वेषां कर्मणामुदयात्मिका ।
सामान्याख्या विशेषाख्या द्वैविध्यात्तद्रसस्य च ॥1108॥
सामान्याख्या यथा कृत्स्नकर्मणामेकलक्षणात् ।
जीवस्याकुलतायाः स्याद्धेतु: पाकागतो रसः ॥1106॥
न चैतदप्रसिद्धं स्याद् दृष्टान्ताद्विषभक्षणात् ।
दुःखस्य प्राणघातस्य कार्यद्वैतस्य दर्शनात् ॥1110॥
कर्माष्टकं विपक्षि स्यात् सुखस्यैकगुणस्य च ।
अस्ति किंचिन्न कर्मेकं तद्विपक्षं तत: पृथक् ॥1111॥
वेदनीयंहि कर्मैकमस्ति चेत्तद्विपक्षि च ।
न यतोऽस्यास्त्यघातित्वं प्रसिद्धं परमागमात् ॥1112॥
अन्वयार्थ : यह बात ठीक है कि जीव का ज्ञानादि गुणों के समान एक सुख-गुण भी है और वह विकृत होकर दुःखरूप होता है जो आठों कर्मों के उदय से होता है ॥११०६-११०७॥ सभी कर्मों की उदयरूप शक्ति दो प्रकार की है -- एक सामान्यरूप और दूसरी विशेषरूप, क्योंकि कर्मों की फलदान शक्ति दो प्रकार की होती है ॥११९०८॥ सामान्यरूप शक्ति सभी कर्मों की एक लक्षणवाली है -- यथा, सम्पूर्ण कर्मों का उदयागत रस जीव की आकुलता का कारण है ॥११०९॥ यह बात असिद्ध भी नहीं है, किन्तु दृष्टान्त से इसका समर्थन होता है । हम देखते हैं कि विष के खाने से दुःख और प्राणों का घात -- ये दो कार्य होते हैं ॥१११०॥ आठों कर्म एक सुख गुण के विपक्षी हैं । इसीलिये प्रथक् रूप से कोई एक कर्म उसका विपक्षी नहीं माना गया है ॥११११॥ यदि कहा जाय कि एक वेदनीय कर्म उसका विपक्षी है सो यह बात नहीं है, क्योंकि परमागम् के अनुसार यह अघातिरूप से प्रसिद्ध है । मात्र वह इसका विपक्षी नहीं हो सकता ॥१११२॥