सत्यमक्षार्थसम्बन्धाज्ज्ञानं नासंयमाय यत्‌ ।
तत्र रागादिबुद्धिर्या संयमस्तन्निरोधनम्‌ ॥1118॥
त्रसस्थावरजीवानां न वधायोद्यतं मन: ।
न वचो न वपुः क्वापि प्राणिसंरक्षणं समृतम् ॥1119॥
इस्युक्तलक्षणो यत्र संयमो नापि लेशत: ।
असंयतत्वं तन्नाम भावोऽस्त्यौदयिकः स च ॥1120॥
अन्वयार्थ : इन्द्रिय और पदार्थ के सम्बन्ध से जो ज्ञान होता है वह असंयम का कारण नहीं है किन्तु उसमें जो राग बुद्धि होती है उसका रोकना ही इन्द्रिय संयम है ॥१११८॥ और त्रस तथा स्थावर जीवों के वध के लिये किसी भी हालत में मन उद्यत न होना, वचन का उद्यत न होना और काय का उद्यत न होना प्राणि संयम है ॥१११९॥ इस तरह पूर्वोक्त लक्षणवाला संयम जहाँ अंशमात्र भी नहीं होता है वह असंतत्व भाव है जो कि औदयिक है ॥११२०॥