
दुर्गमा भोगभूः स्वर्गभूमिर्विद्याधरावनिः ।
नागलोकधरा चातिसुगमा शुद्धचिद्धरा ॥2॥
तत्साधने सुखं ज्ञानं मोचनं जायते समं ।
निराकुलत्वमभयं सुगमा तेम हेतुना ॥3॥
है भोग भू सुरलोक, विद्याधर धरा अहिलोक को ।
पाना कठिन अति सुलभता से शुद्ध चिद्रूप प्राप्त हो ॥४.२॥
क्योंकि सुसाधन में हि होते, जाते सुख मोचन सदा ।
सद्ज्ञान अभय निराकुलत्व, अत: चिद्रूप ध्यान सदा ॥४.३॥
अन्वयार्थ : संसार में भोग-भूमि, स्वर्गभूमि, विद्याधर-लोक और नागलोक की प्राप्ति तो दुर्गम-दुर्लभ है; परन्तु शुद्धचिद्रूप की प्राप्ति अति-सरल है क्योंकि चिद्रूप के साधन में सुख, ज्ञान, मोचन, निराकुलता और भय का नाश ये साथ-साथ होते चले जाते हैं ।