
अन्नाश्मागुरुनागफे नसदृशं स्पर्शेन तस्यांशतः
कौमाराम्रकसीसवारिसदृशं स्वादेन सर्वं वरं ।
गंधेनैव घृतादि वस्त्रसदृशं दृष्टया च शब्देन च
कर्कंर्यादि च मानसेन च यथा शास्त्रादि निश्चीयते ॥4॥
स्मृत्या दृष्टनगाब्धिभूरुहपुरीतिर्यंग्नराणां तथा
सिद्धांतोक्तसुराचलहृदनदीद्वीपादिलोकस्थितेः ।
खार्थानां कृतपूर्वंकार्यविततेः कालत्रयाणामपि
स्वात्मा केवलचिन्मयोंऽशकलनात् सर्वोऽस्य निश्चीयते ॥5॥
अफीम पत्थर अन्न अगरु, आदि जानें अंश के ।
स्पर्श से ईलायची जल, आम आदि स्वाद से॥
घृत आदि जानें गन्ध से, वस्त्रादि जानें आँख से ।
नित शब्द सुनने से हि जानें, झालरादि चित्त से ॥
शास्त्रादि जानें तथाहि, देखे हुए पर्वत जलधि ।
नगरी पशु नर वृक्ष आदि, शास्त्र जानें ह्रद नदी ॥४.४॥
द्वीपादि मेरु लोक स्थिति, पूर्व भोगे इन्द्रियों ।
के विषय तीनों काल के, पहले किए कुछ कार्यों ॥
इत्यादि के स्मरण मय, अंशों से पूरा आत्मा ।
चिन्मय सदा शाश्वत सकल, ज्ञाता निरन्तर जानना ॥४.५॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार अन्न, पाषाण, अगरु और अफीम के समान पदार्थ के कुछ भाग के स्पर्श करने से, इलायची, आम, कसीस और जल के समान पदार्थ के कुछ अंश के स्वाद से, घी आदि के समान पदार्थ के कुछ अंश के सूंघने से, वस्त्र सरीखे पदार्थ के किसी अंश को आँख से देखने से, कर्करी आदि के शब्द श्रवण से और मन से शास्त्र आदि के समस्त स्वरूप का निश्चय कर लिया जाता है। उसीप्रकार पहिले देखे हुये पर्वत, समुद्र, वृक्ष, नगरी, गाय, भैंस आदि तिर्यञ्च और मनुष्यों के, शास्त्रों से जाने गये मेरु हृद, तालाब, नदी और द्वीप आदि लोक की स्थिति के, पहिले अनुभूत इंद्रियों के विषय और किये गये कार्यों के एवं तीनों कालों के स्मरण आदि कुछ अंशों से अखण्ड चैतन्य-स्वरूप के पिंड-स्वरूप इस आत्मा का भी निश्चय कर लिया जाता है ।