+ शुद्ध चिद्रूप-प्राप्ति में कारणभूत स्याद्वाद-शैली -
द्रव्यं क्षेत्रं च कालं च भावमिच्छेत् सुधीः शुभं ।
शुद्धचिद्रूपसंप्राप्ति हेतुभूतं निरंतरं ॥6॥
न द्रव्येन न कालेन न क्षेत्रेण प्रयोजनं ।
के नचिन्नैव भावेन लब्धे शुद्धचिदात्मके ॥7॥
नित शुद्ध चिद्रूप प्राप्ति हेतु भूत चाहे भले ही ।
शुभ द्रव्य क्षेत्र रु काल भाव, सुधी सुआश्रय लें यही ॥४.६॥
पर शुद्ध चिद्रूप लब्धि होने, पर नहीं कुछ प्रयोजन ।
है द्रव्य क्षेत्र रु काल भाव से, अत: निष्पृह प्रवर्तन ॥४.७॥
अन्वयार्थ : जो महानुभाव शुद्धचिद्रूप की प्राप्ति के अभिलाषी हैं, उन्हें चाहिये कि वे उसकी प्रप्ति के अनुपम कारण शुद्ध द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव का सदा आश्रय करें; परन्तु जिस समय शुद्धचिद्रूप की प्राप्ति हो जाय उस समय द्रव्य, क्षेत्र, काल के आश्रय करने की कोई आवश्यकता नहीं ।