+ शुद्ध-चिद्रूप ही ग्राह्य -
मध्ये श्रुताब्धेः परमात्मनाम-रत्नव्रजं वीक्ष्य मया गृहीतं ।
सर्वोत्तमत्वादिदमेव शुद्धचिद्रूपनामातिमहार्घ्यरत्नं ॥9॥
अपार सागर रूप जिनश्रुत में अनेकों नाममय ।
हैं रत्न परमात्मामयी, चिद्रूप शुद्ध अति उत्तम ॥४.९॥
अन्वयार्थ : जैन शास्त्र एक अपार सागर है और उसमें परमात्मा के नामरूपी अनन्त रत्न भरे हये हैं, उनमें से भले प्रकार परीक्षा कर और सबों में अमूल्य उत्तम मान यह शुद्धचिद्रूप का नामरूपी रत्न मैंने ग्रहण किया है ।