
नाहं किंचिन्न मे किंचिद् शुद्धचिद्रूपकं विना ।
तस्मादन्यत्र मे चिंता वृथा तत्र लयं भजे ॥10॥
मैं शुद्ध चिद्रूपी बिना नहिं अन्य कुछ मेरा नहीं ।
यों जान चिन्ता व्यर्थ, सबकी छोड़ मैं स्थिर यहीं ॥४.१०॥
अन्वयार्थ : संसार में सिवाय शुद्धचिद्रूप के न तो मैं कुछ हूँ और न अन्य ही कोई पदार्थ मेरा है इसलिये शुद्धचिद्रूप से अन्य किसी पदार्थ में मेरा चिन्ता करना वृथा है; अतः मैं शद्धचिद्रूप में ही लीन होता हूँ ।