+ व्यवहार-नय के अवलम्बन की मर्यादा -
न यामि शुद्धचिद्रूपे लयं यावदहं दृढं ।
न मुंचामि क्षणं तावद् व्यवहारावलंबनं ॥1॥
इस शुद्ध चिद्रूप में मगन, दृढ़ नहीं होता जानता ।
व्यवहार अवलम्बन तभी तक, मैं कभी नहिं छोड़ता ॥७.१॥
अन्वयार्थ : जब तक मैं दृढ़रूप से शुद्धचिद्रूप में लीन न हो जाऊं तब तक मैं व्यवहारनय का सहारा नहीं छोडूं ।