
अशुद्धं किल चिद्रूपं लोके सर्वत्र दृश्यते ।
व्यवहारनयं श्रित्वा शुद्धं बोधदृशा क्वचित् ॥2॥
अशुद्ध है चिद्रूप जग में, दिखाता व्यवहार ही ।
निश्चय दिखाए सर्वदा, मैं शुद्ध चिद्रूप एक ही ॥६.२॥
अन्वयार्थ : व्यवहारनय के अवलम्बन से सर्वत्र संसार में अशुद्ध ही चिद्रूप दृष्टिगोचर होता है निश्चयनय से शुद्ध तो कहीं किसी आत्मा में दिखता है ।