+ स्वरूप-प्राप्ति-हेतु निर्ममत्व भाव ही कर्तव्य -
निर्ममत्वेन चिद्रूपप्राप्तिर्जाता मनीषिणां ।
तस्मात्तदर्थिना चिंत्यं तदेवैकं मुहूर्मुहुः ॥10॥
नित सुधी को चिद्रूप की, लब्धि हुई निर्ममत्व से ।
अतएव बारम्बार, निर्मता विचारो चाहते ॥१०.१०॥
अन्वयार्थ : जिन किन्हीं विद्वान मनुष्यों को शुद्धचिद्रूप की प्राप्ति हुई है, उन्हें शरीर आदि परपदार्थों में ममता न रखने से ही हुई है, इसलिये जो महानुभाव शुद्धचिद्रूप की प्राप्ति के अभिलाषी हैं उन्हें चाहिये कि वे निर्ममत्व का ही बार-बार चिंतवन करें, उसी की ओर अपनी दृष्टि लगाये ।