गौरश्वोऽजो गजो रा विरापणं मंदिरं मम ।
पूः राजा मम देशश्च ममत्वमिति चिंतनम् ॥9॥
गज अज नगर धन गाय घोड़ा, देश पक्षी घर सभी ।
बाजार राजा आदि मेरे, यों विचार ममत्व ही ॥१०.९॥