गौरश्वो गजो रा विरापणं मंदिरं न मे ।
पू राजा मे न देशो निर्ममत्वमिति चितनं॥12॥
गज गाय घोड़ा घर नगर, बाजार राजा देश भी ।
धन खगादि मेरे नहीं, यों सोच निर्ममता यही ॥१०.१२॥