
ममेति चिंतनाद् बंधो मोचनं न ममेत्यतः ।
बंधनं द्वयक्षराभ्यां च मोचनं त्रिभिरक्षरैः ॥13॥
'ये मेरे' चिन्तन से बँधे, 'मेरे नहीं' से छूटते ।
यों दो (मम) से बन्धन, तीन अक्षर (मम न) मोक्ष हेतु हैं कहें ॥१०.१३॥
अन्वयार्थ : 'स्त्री-पुत्र आदि मेरे हैं ' इस प्रकार के चिंतन से कर्मों का बंध होता है और 'ये मेरे नहीं' ऐसा चिंतन से कर्म नष्ट होते हैं, इसलिये 'मम ' ये दो अक्षर तो कर्मबंध के कारण हैं और 'मम न' इन तीन अक्षरों के चितवन करने से कर्मों की मुक्ति होती है ।