+ ज्ञानी जीव की प्रवृत्ति -
वदन्नन्यैर्हसन् गच्छन् पाठयन्नागमं पठन् ।
आसनं शयनं कुर्वन् शोचनं रोदनं भयं ॥21॥
भोजनं क्रोधलोभादि कुर्वन् कर्मवशात् सुधीः ।
न मुंचति क्षणार्द्धं स शुद्धचिद्रूपचिंतनं ॥22॥
वे बोलते हँसते जिनागम, पढ़ाते पढ़ते हुए ।
चलते शयन करते ठहरते, शोक रोदन भय करें ॥१४.२१॥
भोजन कषायादि कर्म-वश करें शुद्ध चिद्रूप का ।
चिन्तन नहीं छोड़ें कभी, वे सुधी ध्याते निज सदा ॥१४.१२॥
अन्वयार्थ : जो पुरुष बुद्धिमान हैं, यथार्थ में शुद्ध-चिद्रूप के स्वरूप के जानकार हैं; वे कर्मों के फन्द में फँसकर बोलते, हँसते, चलते, आगम को पढ़ाते, पढ़ते, बैठते, सोते, शोक करते, रोते, डरते, खाते, पीते और क्रोध, लोभ आदि को भी करते हुए क्षण भर के लिए भी शुद्ध-चिद्रूप के स्वरूप से विचलित नहीं होते; वे प्रति-क्षण शुद्ध-चिद्रूप का ही चिन्तन करते रहते हैं ।