+ अप्रतिहत भाव से आत्माराधना की प्रेरणा -
स्वकीयं शुद्धचिद्रूपं ये न मुंचंति सर्वदा ।
गच्छंतोऽप्यन्यलोकं ते सम्यगभ्यासतो न हि ॥19॥
तथा कुरु सदाभ्यासं शुद्धचिद्रूपचिंतने ।
संक्लेशे मरणे चापि तद्विनाशं यथैति न ॥20॥
निज शुद्ध चिद्रूप को नहीं, जो छोड़ते हैं कभी भी ।
वे अन्य भव जाएं तथापि, दृढ़ाभ्यास तजें नहीं ॥१४.१९॥
यों जान शुद्ध चिद्रूप, चिन्तन का सदा अभ्यास कर ।
जिससे भयंकर दु:ख या मरणादि में भी सुरक्षित ॥१४.२०॥
अन्वयार्थ : जो महानुभाव आत्मिक शुद्ध-चिद्रूप का कभी त्याग नहीं करते; वे यदि अन्य भव में भी चले जाएँ तो भी उनके शुद्ध-चिद्रूप का अभ्यास नहीं छूटता । पहले भव में जैसी उनकी शुद्धरूप में लीनता रहती है, वैसी ही बनी रहती है; इसलिए हे आत्मन! तुशुद्ध-चिद्रूप के ध्यान का इस रूप से सदा अभ्यास करो; जिससे कि भयंकर दु:ख और मरण के प्राप्त हो जाने पर भी उसका विनाश न हो; वह ज्यों का त्यों बना रहे ।