
सुतादौ भार्यादौ वपुषि सदने पुस्तक धने
पुरादौ मंत्रादौ यशसि पठने राज्यकदने ।
गवादौ भक्तादौ सुहृदि दिवि वाहे खविषये
कुधर्मे वांछा स्यात् सुरतरुमुखे मोहवशतः ॥2॥
हो मोह-वश से सुत सुता, माता तिया तन घर नगर ।
हैं ग्राम पुस्तक मन्त्र यश, गज सवारी इंद्रिय विषय ॥
भोजन पठन गो मित्र स्वर्ग, कुधर्म सुरतरु राज्य में ।
युद्धादि में वांछा सदा, निज भूल दोषी लोक में ॥१५.२॥
अन्वयार्थ : इस दीन जीव की मोह के वश से पुत्र, पुत्री, स्त्री, माता, शरीर, घर, पुस्तक, धन, पुर, नगर, मंत्र, कीर्ति, ग्रन्थों का अभ्यास, राज्य, युद्ध, गौ, हाथी, भोजन, मित्र, स्वर्ग, सवारी, इंद्रियों के विषय, कुधर्म और कल्पवृक्ष आदि में वांछा होती है ।