+ आत्म-हित-हेतु स्वयं को संबोधन -
किं पर्यायैविभावैस्तव हि चिदचित्तां व्यंजनार्थाभिधानैः
रागद्वेषाप्तिबीजैर्जगति परिचितैः कारणैः संसृतेश्च ।
मत्वैवं त्वं चिदात्मन् परिहर सततं चिंतनं मंक्षु तेषां
शुद्धे द्रव्ये चिति स्वे स्थितिमचलतयांतर्दृशा संविधेहि ॥3॥
चेतन अचेतन सभी व्यंजन, अर्थ पर्यायें कहीं ।
विकृतमई राग द्वेष हेतु, सुचिर परिचित हैं सभी ॥
संसार हेतु मान तज, अति शीघ्र चिन्तन आदि भी ।
चिद्रूप अपने द्रव्य में, अन्तर्दृशी रह अचल ही ॥१५.३॥
अन्वयार्थ : हे चिदात्मन्! संसार में चेतन और अचेतन की जो अर्थ और व्यंजन पर्याय मालूम पड़ रही हैं, वे सब स्वभाव नहीं हैं; विभाव हैं, निन्दित हैं, राग-द्वेष आदि की और संसार की कारण हैं - ऐसा भले प्रकार निश्चय कर तु इनका विचार करना छोड़ दो और आत्मिक शुद्ध-चिद्रूप को अपनी अन्तर्दृष्टि से भले प्रकार पहिचान कर उसी में निश्चलरूप से स्थिति करो ।