
विविक्तस्थानकाभावात् योगिनां जनसंगमः ।
तेषामालोकनेनैव वचसा स्मरणेन च ॥18॥
जायते मनसः स्पंदस्ततो रागादयोऽखिलाः ।
तेभ्यः क्लेशो भवेत्तस्मान्नाशं याति विशुद्धता ॥19॥
तया विना न जायेत शुद्धचिद्रूपचिंतनं ।
विना तेन न मुक्तिः स्यात् परमाखिलकर्मणां ॥20॥
तस्माद्विविक्तसुस्थानं ज्ञेयं क्लेशनाशनं ।
मुमुक्षुयोगिनां मुक्तेः कारणं भववारणं ॥21॥
एकान्त स्थल नहीं हो तो, योगि संकट सम रहें ।
जन संघ उनको देखने, वचनादि से स्मरण से ॥१६.१८॥
मन हुआ चंचल हों उसी से दोष रागादि सभी ।
उससे क्लेश विनष्ट उससे, विशुद्धि संचित सभी ॥१६.१८॥
उसके विना निजरूप चिन्तन, नहीं हो सकता कभी ।
तब नहीं मुक्ति नहीं है सब कर्म का क्षय भी कभी ॥१६.१९॥
विविक्त स्थल समझ यह संक्लेश का नाशक सदा ।
भव निवारक नित मोक्ष कारक, मुुक्षु निज योगि का ॥१६.२०॥
अन्वयार्थ : एकान्त स्थान के अभाव से योगियों को जनों के संघ में रहना पड़ता है; इसलिए उनके देखने, वचन सुनने और स्मरण करने से उनका मन चंचल हो उठता है । मन की चंचलता से विशुद्धि का नाश होता है और विशुद्धि के विना शुद्ध-चिद्रूप का चिन्तन नहीं हो सकता । उसका चिन्तन किए विना समस्त कर्मों के नाश से होनेवाला मोक्ष नहीं प्राप्त हो सकता; इसलिए मोक्षाभिलाषी योगियों को चाहिए कि वे एकान्त स्थान को समस्त दु:खों का दूर करनेवाला, मोक्ष का कारण और संसार का नाश करनेवाला जान, अवश्य उसका आश्रय करें ।