+ आत्माराधना के योग्य स्थान -
भूमिगृहे समुद्रादितटे पितृवने वने ।
गुहादौ वसति प्राज्ञः शुद्धचिद्ध्यानसिद्धये ॥17॥
नित भूमि गृह सागर तटादि, वन गुफादि मसान में ।
निज शुद्ध चिद्रूप ध्यान हेतु, सुधी रहते आत्म में ॥१६.१७॥
अन्वयार्थ : जो मनुष्य बुद्धिमान हैं, हित-अहित के जानकार हैं; वे शुद्ध-चिद्रूप के ध्यान की सिद्धि के लिए जमीन के भीतरी घरों/तलघरों में, सुरंगों में; समुद्र, नदी आदि के तटों पर; श्मसान भूमियों में और वन, गुफा आदि निर्जन स्थानों में निवास करते हैं ।