
निर्द्रव्यं स्ववशं निजस्थमभयं नित्यं निरीहं शुभं
निर्द्वंदं निरुपद्रवं निरुपमं निर्बंधमूहातिगं ।
उत्कृष्टं शिवहेत्वदोषममलं यद्दुर्लभं केवलं
स्वात्मोत्थं सुखमीदृशं च स्वभवं तस्माद्विरुद्धं भवेत् ॥2॥
पर धनादि से रहित, स्व-वश आत्मीक अभय सदा ।
निष्कांक्ष शुभ निर्द्वन्द्व, बाधा-रहित अनुपम श्रेष्ठता ॥
निर्बन्ध तर्कादि अगोचर, अमल शिवकर दोष बिन ।
दुर्लभ अति स्वात्मोत्थ सुख, अज्ञ मान्य सुख इससे विरुद्ध ॥१७.२॥
अन्वयार्थ : यह आत्मोत्थ निराकुलतामय सुख, निर्द्रव्य है; पर-द्रव्यों के सम्पर्क से रहित है; स्वाधीन आत्मिक, भयों से रहित, नित्य, समस्त प्रकार की इच्छाओं से रहित, शुभ, निर्द्वन्द्व, सब प्रकार के उपद्रवों से रहित, अनुपम, कर्म-बन्धों से रहित, तर्क-वितर्क के अगोचर, उत्कृष्ट, कल्याण को करनेवाला, निर्दाेष, निर्मल और दुर्लभ है; परन्तु इंद्रिय-जन्य सुख सर्वथा इसके विरुद्ध है ।