+ एकान्त स्थान में रहने-हेतु प्रेरित -
वैराग्यं त्रिविधं निधाय हृदये हित्वा च संगे त्रिधा
श्रित्वा सद्गुरुमागमं च विमलं धृत्वा च रत्नत्रयं ।
त्यक्त्वान्यैः सह संगतिं च सकलं रागादिकं स्थानके
स्थातव्यं निरुपद्रवेऽपि विजने स्वात्मोत्थसौख्याप्तये ॥3॥
भव भोग तन विरति परिग्रह त्रिविध त्यागी जिनागम ।
सद्गुरु आश्रय ले धरे निर्मल रतनत्रय अन्य सब ॥
संगति सब रागादि तज, निर्बाध निर्जन सुथल में ।
स्वात्मोत्थ सुख की प्राप्ति हेतु, रहे नित निज आत्म में ॥१७.३॥
अन्वयार्थ : जो पुरुष आत्मिक शान्तिमय सुख के अभिलाषी हैं, उसे हस्तगत करना चाहते हैं; उन्हें चाहिए कि वे संसार, शरीर और भोगों के त्यागरूप तीन प्रकार का वैराग्य धारण कर; चेतन, अचेतन और मिश्र तीनों प्रकार का परिग्रह छोड़कर; सद्गुरु, निर्दोष शास्त्र, सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र-स्वरूप रत्नत्रय का आश्रय कर, दूसरे जीवों का सहवास और राग-द्वेष आदि का सर्वथा त्यागकर, सब उपद्रवों से रहित एकान्त स्थान में निवास करें ।