ग्रंथसंख्यात्र विज्ञेया लेखकैः पाठकैः किल ।
षट्त्रिंशदधिका पंचशती श्रोतृजनैरपि ॥24॥
बत्तीस अक्षरमय अनुष्टुप् छन्द के अनुसार है ।
यह पाँच सौ छत्तीस संख्या, मात्र जानों ग्रन्थ है ॥
कुल पद्य संख्या तीन सौ संतानवै अध्याय हैं ।
कुल अठारह इस ग्रन्थ में, यह सभी जन ही जान लें ॥१८.२४॥
अन्वयार्थ : इस ग्रन्थ की सब श्लोक संख्या पाँच सौ छत्तीस है; ऐसा लेखक, पाठक और श्रोताओं को समझ लेना चाहिए अर्थात् यह ग्रन्थ पाँच सौ छत्तीस श्लोकों में समाप्त हुआ है ।