
यदैव विक्रमातीताः शतपंचदशाधिकाः ।
षष्टिः संवत्सरा जातास्तदेयं निर्मिता कृतिः ॥23॥
जब पन्द्रह सौ साठ वर्ष, समाप्त विक्रम संवत् ।
तब ज्ञानभूषण यति द्वारा, हुई है यह निर्मित ॥१८.२३॥
अन्वयार्थ : जिस समय विक्रम संवत् के पन्द्रह सौ साठ वर्ष बीत चुके थे, उस समय इस तत्त्वज्ञान-तरंगिणीरूपी कृति का निर्माण किया गया ।