वरसैद्धान्तिकचक्रेश्वर नयकीर्ति-व्रतीश-
सुतनखिलकला-धरनिषदं निजचिद्गुण-
परिणतनध्यात्मिबालचन्द्रमुनीन्द्रम् ॥1॥
अमृताशीतिगे टीकनुद्धरिसिदं-
कर्नाटदिंदात्मतत्त्वमनत्युत्तमबोध-
दृक्-सुखदमं चन्द्रप्रभार्यगे कूर्त्तु मन बोक्किरे -
पेल्वेनेम्ब बगेयिं श्री बालचन्द्र सदा-
विमलं श्री नयकीर्ति देवतनयं चारित्रचक्रेश्वरम् ॥2॥
॥ श्रीवीरनाथाय नम: ॥
॥ श्री पंचगुरुभ्यो नम: ॥
॥ श्रीवीतरागाय नम: ॥
अन्वयार्थ : सर्वदा शुद्ध चारित्रचक्रवर्ती श्री नयकीर्तिदेव के शिष्य श्री बालचन्द्र अत्यन्त श्रेष्ठ ज्ञान-दर्शन व सुख को देने वाले तथा आत्मतत्त्व को आत्मसात् कराने वाले अमृताशीति की कन्नड भाषा के द्वारा टीका को चन्द्रप्रभार्य के लिए प्रतिपादन करने की इच्छा से सम्बोधित करते हुए उद्धृत करते हैं ।
श्री महावीर स्वामी को नमस्कार हो । श्री पच्रपरमेष्ठियो को नमस्कार हो !! श्री वीतराग को नमस्कार हो !!!