
चंचच्चन्द्रोरुरोची-रुचिरतरवच: क्षीरनीरप्रवाहे,
मज्जन्तोऽपि प्रमोदं परममरनरा संज्ञिनोऽगुर्यदीये ।
योगज्वालायमान-ज्वलदनलशिखा-क्लेशवल्ली-विहोता,
योगीन्द्रो व: सचन्द्रप्रभविभुरविभुर्मंगलं सर्वकालम् ॥80॥
अन्वयार्थ : जिसके सर्वत: प्रकाशमान चन्द्रमा की विस्तृत किरणों की प्रभा से भी अधिक मनोहर वाणी रूपी क्षीर की जलधारा में समनस्क देवगण तथा मनुष्य स्नान करते हुए भी अत्यधिक हर्ष को प्राप्त हुए हैं। योग-साधनारूपी प्रकाशमान प्रज्वलित अग्नि-शिखा में क्लेशों की लता का हवन करनेवाले योगियों के इन्द्र जिसका अन्य कोई स्वामी न हो चन्द्रप्रभ स्वामी सर्वदा हमारे लिए मंगलकारी हों ।