+ उपसंहार -
सोऊण तच्चसारं रइयं मुणिणाह देवसेणेण ।
जो सद्दिट्टी भावइ सो पावइ सासयं सोक्खं ॥74॥
देवसेन मुनिराज, तत्त्वसार आगम कह्यौ ।
जो ध्यावै हितकाज, सो ज्ञाता सिवसुख लहै ॥74॥
अन्वयार्थ : [जो सद्दिट्ठी] जो सम्यग्दृष्टि [मुणिणाहदेवसेणेण] मुनिनाथ देवसेन के द्वारा [रइयं] रचित [तच्चसारं] इस तत्त्वसार को [सोऊण] सुनकर [भावइ] उसकी भावना करेगा, [सो] वह [सासयं सोक्खं] शाश्वत सुख को [पावइ] पावेगा ।