+ स्व-पर गत तत्त्व के ज्ञान का महत्व -
जं अल्लीणा जीवा तरंति संसारसायरं विसमं ।
तं भव्वजीवसरणं णंदउ सग-परगयं तच्चं ॥73॥
ते हैं भव्य सहाय, जे दुस्तर भवदधि तरैं ।
तत्त्वसार यह गाय, जैवंतौ प्रगटौ सदा ॥73॥
अन्वयार्थ : [जं अल्लीणा] जिसमें तल्लीन हुए [जीवा] जीव [विसमं] विषम [संसार-सायरं] संसार समुद्र को [तरंति] तिर जाते हैं [त] वह [भव्वजीवसरणं] भव्य जीवों को शरणभूत [सग-परगयं] स्व और परगत [तच्चं] तत्त्व [णंदउ] सदा वृद्धि को प्राप्त हो ।