
पद्मप्रभमलधारिदेव : संस्कृत
आर्तरौद्रध्यानपरित्यागात् सनातनसामायिकव्रतस्वरूपाख्यानमेतत् । यस्तु नित्यनिरंजननिजकारणसमयसारस्वरूपनियतशुद्धनिश्चयपरमवीतरागसुखामृत-पानपरायणो जीवः तिर्यग्योनिप्रेतावासनारकादिगतिप्रायोग्यतानिमित्तम् आर्तरौद्रध्यानद्वयं नित्यशः संत्यजति, तस्य खलु केवलदर्शनसिद्धं शाश्वतं सामायिकव्रतं भवतीति । (कलश--आर्या) इति जिनशासनसिद्धं सामायिकव्रतमणुव्रतं भवति । यस्त्यजति मुनिर्नित्यं ध्यानद्वयमार्तरौद्राख्यम् ॥२१४॥ यह, आर्त और रौद्र ध्यान के परित्याग द्वारा सनातन (शाश्वत) सामायिक-व्रत के स्वरूप का कथन है । नित्य - निरंजन निज कारण-समयसार के स्वरूप में नियत (नियम से स्थित) शुद्ध-निश्चय - परम-वीतराग-सुखामृत के पान में परायण ऐसा जो जीव तिर्यंचयोनि, प्रेतवास और नारकादिगति की योग्यता के हेतुभूत आर्त और रौद्र दो ध्यानों को नित्य छोड़ता है, उसे वास्तव में केवल-दर्शन सिद्ध (केवलदर्शन से निश्चित हुआ) शाश्वत सामायिकव्रत है । (कलश--सोरठा)
इसप्रकार, जो मुनि आर्त और रौद्र नाम के दो ध्यानों को नित्य छोड़ता है उसे जिन-शासन सिद्ध (जिनशासन से निश्चित हुआ) अणुव्रत रूप सामायिकव्रत है ।
जो मुनि छोड़े नित्य आर्त्त-रौद्र ये ध्यान दो । सामायिकव्रत नित्य उनको जिनशासन कथित ॥२१४॥ |