
पद्मप्रभमलधारिदेव : संस्कृत
भगवतः सिद्धस्य स्वभावगुणस्वरूपाख्यानमेतत्। निरवशेषेणान्तर्मुखाकारस्वात्माश्रयनिश्चयपरमशुक्लध्यानबलेन ज्ञानावरणाद्यष्टविध-कर्मविलये जाते ततो भगवतः सिद्धपरमेष्ठिनः केवलज्ञानकेवलदर्शनकेवलवीर्य-केवलसौख्यामूर्तत्वास्तित्वसप्रदेशत्वादिस्वभावगुणा भवंति इति । (कलश--मंदाक्रांता) बन्धच्छेदाद्भगवति पुनर्नित्यशुद्धे प्रसिद्धे तस्मिन्सिद्धे भवति नितरां केवलज्ञानमेतत् । द्रष्टिः साक्षादखिलविषया सौख्यमात्यंतिकं च शक्त्याद्यन्यद्गुणमणिगणं शुद्धशुद्धश्च नित्यम् ॥३०२॥ यह, भगवान सिद्ध के स्वभावगुणों के स्वरूप का कथन है । निरवशेषरूप से अन्तर्मुखाकार (सर्वथा अन्तर्मुख जिसका स्वरूप है ऐसे), स्वात्माश्रित निश्चय - परमशुक्लध्यान के बल से ज्ञानावरणादि आठ प्रकार के कर्मों का विलय होने पर, उस कारण से भगवान सिद्धपरमेष्ठी को केवलज्ञान, केवलदर्शन, केवलवीर्य, केवलसुख, अमूर्तत्व, अस्तित्व, सप्रदेशत्व आदि स्वभावगुण होते हैं । (कलश--रोला)
बन्ध के छेदन के कारण, भगवान तथा नित्यशुद्ध ऐसे उस प्रसिद्ध सिद्ध में (सिद्ध परमेष्ठी में) सदा अत्यन्तरूप से यह केवलज्ञान होता है, समग्र जिसका विषय है ऐसा साक्षात् दर्शन होता है, आत्यंतिक सौख्य होता है तथा शुद्धशुद्ध ऐसा वीर्यादिक अन्य गुणरूपी मणियों का समूह होता है ।
बंध-छेद से नित्य शुद्ध प्रसिद्ध सिद्ध में । ज्ञानवीर्यसुखदर्शन सब क्षायिक होते हैं ॥ गुणमणियों के रत्नाकर नित शुद्ध शुद्ध हैं । सब विषयों के ज्ञायक दर्शक शुद्ध सिद्ध हैं ॥३०२॥ |