+ सिद्धक्षेत्र से ऊपर जीव-पुद्गलों के गमन का निषेध -
जीवाण पुग्गलाणं गमणं जाणेहि जाव धम्मत्थी ।
धम्मत्थिकायभावे तत्तो परदो ण गच्छंति ॥184॥
जीवानां पुद्गलानां गमनं जानीहि यावद्धर्मास्तिकः ।
धर्मास्तिकायाभावे तस्मात्परतो न गच्छंति ॥१८४॥
जानो वहीं तक जीव-पुद्गलगति, जहाँ धर्मास्ति है ।
धर्मास्तिकाय-अभाव में आगे गमन की नास्ति है ॥१८४॥
अन्वयार्थ : [यावत् धर्मास्तिकः] जहाँ तक धर्मास्तिकाय है वहाँ तक [जीवानां पुद्गलानां] जीवों का और पुद्गलों का [गमनं] गमन [जानीहि] जान; [धर्मास्तिकायाभावे] धर्मास्तिकाय के अभाव में [तस्मात् परतः] उससे आगे [न गच्छंति] वे नहीं जाते ।
Meaning :  Movements of souls and matter should be known as co-extensive with the medium of motion (Dharmastikaya). They can not go further, because there is no medium of motion.

  पद्मप्रभमलधारिदेव 

पद्मप्रभमलधारिदेव : संस्कृत
अत्र सिद्धक्षेत्रादुपरि जीवपुद्गलानां गमनं निषिद्धम् ।
जीवानां स्वभावक्रिया सिद्धिगमनं, विभावक्रिया षटकापक्रमयुक्त त्वम्; पुद्गलानांस्वभावक्रिया परमाणुगतिः, विभावक्रिया व्द्यणुकादिस्कन्धगतिः । अतोऽमीषां त्रिलोक-शिखरादुपरि गतिक्रिया नास्ति, परतो गतिहेतोर्धर्मास्तिकायाभावात्; यथा जलाभावे मत्स्यानां गतिक्रिया नास्ति । अत एव यावद्धर्मास्तिकायस्तिष्ठति तत्क्षेत्रपर्यन्तं स्वभावविभाव-गतिक्रियापरिणतानां जीवपुद्गलानां गतिरिति ।
(कलश--अनुष्टुभ्)
त्रिलोकशिखरादूर्ध्वं जीवपुद्गलयोर्द्वयोः ।
नैवास्ति गमनं नित्यं गतिहेतोरभावतः ॥३०४॥



यहाँ, सिद्धक्षेत्र से ऊपर जीव-पुद्गलों के गमन का निषेध किया है ।

जीवों की स्वभाव-क्रिया सिद्धि-गमन (सिद्धक्षेत्र में गमन) है और विभाव-क्रिया छह दिशा में गमन है; पुद्गलों की स्वभाव-क्रिया परमाणु की गति है और विभाव-क्रिया *द्वि-अणुकादि स्कन्धों की गति है । इसलिये इनकी (जीव पुद्गलों की) गतिक्रिया त्रिलोक के शिखर से ऊपर नहीं है, क्योंकि आगे गतिहेतु (गति के निमित्तभूत) धर्मास्तिकाय का अभाव है; जिसप्रकार जल के अभाव में मछलियों की गतिक्रिया नहीं होती उसीप्रकार । इसी से, जहाँ तक धर्मास्तिकाय है उस क्षेत्र तक स्वभाव गतिक्रिया और विभाव गतिक्रियारूप से परिणत जीव-पुद्गलों की गति होती है ।

(कलश--रोला)
तीन लोक के शिखर सिद्ध स्थल के ऊपर ।
गति हेतु के कारण का अभाव होने से ॥
अरे कभी भी पुद्गल जीव नहीं जाते हैं ।
आगम में यह तथ्य उजागर किया गया है ॥३०४॥
गतिहेतु के अभाव के कारण, सदा (कदापि) त्रिलोक के शिखर से ऊपर जीव और पुद्गल दोनों का गमन नहीं ही होता ।

*द्वि-अणुकादि स्कन्ध = दो परमाणुओं से लेकर अनन्त परमाणुओं के बने हुए स्कन्ध ।