
पद्मप्रभमलधारिदेव : संस्कृत
अत्र सिद्धक्षेत्रादुपरि जीवपुद्गलानां गमनं निषिद्धम् । जीवानां स्वभावक्रिया सिद्धिगमनं, विभावक्रिया षटकापक्रमयुक्त त्वम्; पुद्गलानांस्वभावक्रिया परमाणुगतिः, विभावक्रिया व्द्यणुकादिस्कन्धगतिः । अतोऽमीषां त्रिलोक-शिखरादुपरि गतिक्रिया नास्ति, परतो गतिहेतोर्धर्मास्तिकायाभावात्; यथा जलाभावे मत्स्यानां गतिक्रिया नास्ति । अत एव यावद्धर्मास्तिकायस्तिष्ठति तत्क्षेत्रपर्यन्तं स्वभावविभाव-गतिक्रियापरिणतानां जीवपुद्गलानां गतिरिति । (कलश--अनुष्टुभ्) त्रिलोकशिखरादूर्ध्वं जीवपुद्गलयोर्द्वयोः । नैवास्ति गमनं नित्यं गतिहेतोरभावतः ॥३०४॥ यहाँ, सिद्धक्षेत्र से ऊपर जीव-पुद्गलों के गमन का निषेध किया है । जीवों की स्वभाव-क्रिया सिद्धि-गमन (सिद्धक्षेत्र में गमन) है और विभाव-क्रिया छह दिशा में गमन है; पुद्गलों की स्वभाव-क्रिया परमाणु की गति है और विभाव-क्रिया *द्वि-अणुकादि स्कन्धों की गति है । इसलिये इनकी (जीव पुद्गलों की) गतिक्रिया त्रिलोक के शिखर से ऊपर नहीं है, क्योंकि आगे गतिहेतु (गति के निमित्तभूत) धर्मास्तिकाय का अभाव है; जिसप्रकार जल के अभाव में मछलियों की गतिक्रिया नहीं होती उसीप्रकार । इसी से, जहाँ तक धर्मास्तिकाय है उस क्षेत्र तक स्वभाव गतिक्रिया और विभाव गतिक्रियारूप से परिणत जीव-पुद्गलों की गति होती है । (कलश--रोला)
गतिहेतु के अभाव के कारण, सदा (कदापि) त्रिलोक के शिखर से ऊपर जीव और पुद्गल दोनों का गमन नहीं ही होता ।तीन लोक के शिखर सिद्ध स्थल के ऊपर । गति हेतु के कारण का अभाव होने से ॥ अरे कभी भी पुद्गल जीव नहीं जाते हैं । आगम में यह तथ्य उजागर किया गया है ॥३०४॥ *द्वि-अणुकादि स्कन्ध = दो परमाणुओं से लेकर अनन्त परमाणुओं के बने हुए स्कन्ध । |