+ नियम शब्द का तथा उसके फल का उपसंहार -
णियमं णियमस्स फलं णिद्दिट्ठं पवयणस्स भत्तीए ।
पुव्वावरविरोधो जदि अवणीय पूरयंतु समयण्हा ॥185॥
नियमो नियमस्य फलं निर्दिष्टं प्रवचनस्य भक्त्या ।
पूर्वापरविरोधो यद्यपनीय पूरयंतु समयज्ञाः ॥१८५॥
जिनदेव-प्रवचन-भक्तिबल से नियम, तत्फल में कहे ।
यदि हो कहीं, समयज्ञ पूर्वापर विरोध सुधारिये ॥१८५॥
अन्वयार्थ : [नियमः] नियम और [नियमस्य फलं] नियम का फल [प्रवचनस्य भक्त्या] प्रवचन की भक्ति से [निर्दिष्टम्] दर्शाये गये । [यदि] यदि (उसमें कुछ) [पूर्वापरविरोधः] पूर्वापर (आगे पीछे) विरोध हो तो [समयज्ञाः] समयज्ञ (आगमके ज्ञाता) [अपनीय] उसे दूर करके [पूरयंतु] पूर्ति करना ।
Meaning :  Niyama (the path of Liberation) and the fruit of that Niyama (i.e., supreme Liberation) have been describedon being prompted by Devotion for Scriptures, (Pravachana Bhakti). If there are any inconsistencies (in the description), the scholars should remove them and make (this treatise) complete.

  पद्मप्रभमलधारिदेव 

पद्मप्रभमलधारिदेव : संस्कृत
शास्त्रादौ गृहीतस्य नियमशब्दस्य तत्फ लस्य चोपसंहारोऽयम् ।

नियमस्तावच्छुद्धरत्नत्रयव्याख्यानस्वरूपेण प्रतिपादितः । तत्फलं परमनिर्वाण-मिति प्रतिपादितम् । न कवित्वदर्पात् प्रवचनभक्त्या प्रतिपादितमेतत् सर्वमिति यावत् ।यद्यपि पूर्वापरदोषो विद्यते चेत्तद्दोषात्मकं लुप्त्वा परमकवीश्वरास्समयविदश्चोत्तमं पदं कुर्वन्त्विति ।
(कलश--मालिनी)
जयति नियमसारस्तत्फलं चोत्तमानां
हृदयसरसिजाते निर्वृतेः कारणत्वात् ।
प्रवचनकृतभक्त्या सूत्रकृद्भिः कृतो यः
स खलु निखिलभव्यश्रेणिनिर्वाणमार्गः ॥३०५॥



यह, शास्त्रके आदि में लिये गये नियम शब्द का तथा उसके फल का उपसंहार है ।

प्रथम तो, नियम शुद्ध-रत्नत्रय के व्याख्यान स्वरूप में प्रतिपादित किया गया; उसका फल परम निर्वाण के रूप में प्रतिपादित किया गया । यह सब कवित्व के अभिमान से नहीं किन्तु प्रवचन की भक्ति से प्रतिपादित किया गया है । यदि (उसमें कुछ) पूर्वापर दोष हो तो समयज्ञ परम कवीश्वर दोषात्मक पद का लोप करके उत्तम पद करना ।

(कलश--रोला)
नियमसार अर तत्फल यह उत्तम पुरुषों के ।
हृदय कमल में शोभित है प्रवचन भक्ति से ॥
सूत्रकार ने इसकी जो अद्भुत रचना की ।
भविकजनों के लिए एक मुक्तीमारग है ॥३०५॥
मुक्ति का कारण होने से नियमसार तथा उसका फल उत्तमपुरुषों के हृदय-कमल में जयवन्त है । प्रवचन की भक्ति से सूत्रकार ने जो किया है (अर्थात् श्रीमद्भगवत्कुन्दकुन्दाचार्यदेव ने जो यह नियमसार की रचना की है), वह वास्तव में समस्त भव्यसमूह को निर्वाण का मार्ग है ।