
पद्मप्रभमलधारिदेव : संस्कृत
इह हि भव्यस्य शिक्षणमुक्तम् । केचन मंदबुद्धयः त्रिकालनिरावरणनित्यानंदैकलक्षणनिर्विकल्पकनिजकारणपरमात्म-तत्त्वसम्यक्श्रद्धानपरिज्ञानानुष्ठानरूपशुद्धरत्नत्रयप्रतिपक्षमिथ्यात्वकर्मोदयसामर्थ्येन मिथ्या-दर्शनज्ञानचारित्रपरायणाः ईर्ष्याभावेन समत्सरपरिणामेन सुन्दरं मार्गं सर्वज्ञवीतरागस्य मार्गं पापक्रियानिवृत्तिलक्षणं भेदोपचाररत्नत्रयात्मकमभेदोपचाररत्नत्रयात्मकं केचिन्निन्दन्ति, तेषां स्वरूपविकलानां कुहेतुद्रष्टान्तसमन्वितं कुतर्कवचनं श्रुत्वा ह्यभक्तिं जिनेश्वरप्रणीतशुद्ध-रत्नत्रयमार्गे हे भव्य मा कुरुष्व, पुनर्भक्ति : कर्तव्येति । (कलश--शार्दूलविक्रीडित) देहव्यूहमहीजराजिभयदे दुःखावलीश्वापदे विश्वाशातिकरालकालदहने शुष्यन्मनीयावने । नानादुर्णयमार्गदुर्गमतमे द्रङ्मोहिनां देहिनां जैनं दर्शनमेकमेव शरणं जन्माटवीसंकटे ॥३०६॥ तथा हि - (कलश--शार्दूलविक्रीडित) लोकालोकनिकेतनं वपुरदो ज्ञानं च यस्य प्रभो- स्तं शंखध्वनिकंपिताखिलभुवं श्रीनेमितीर्थेश्वरम् । स्तोतुं के भुवनत्रयेऽपि मनुजाः शक्ताः सुरा वा पुनः जाने तत्स्तवनैककारणमहं भक्ति र्जिनेऽत्युत्सुका ॥३०७॥ यहाँ भव्य को शिक्षा दी है । कोई मंदबुद्धि त्रिकाल-निरावरण, नित्य आनन्द जिसका एक लक्षण है ऐसे निर्विकल्प निज कारण-परमात्मतत्त्व के सम्यक्-श्रद्धान-ज्ञान-अनुष्ठानरूप शुद्ध रत्नत्रय से प्रतिपक्ष मिथ्यात्व कर्मोदय के सामर्थ्य द्वारा मिथ्यादर्शन-ज्ञान-चारित्र परायण वर्तते हुए ईर्षा-भाव से अर्थात् मत्सर-युक्त परिणाम से सुन्दर मार्ग को, पाप क्रिया से निवृत्ति जिसका लक्षण है ऐसे भेदोपचार - रत्नत्रयात्मक तथा अभेदोपचार - रत्नत्रयात्मक सर्वज्ञ वीतराग के मार्ग को, निन्दते हैं, उन स्वरूप-विकल (स्वरूप प्राप्ति रहित) जीवों के कुहेतु -कुदृष्टान्त युक्त कुतर्क वचन सुनकर जिनेश्वर प्रणीत शुद्ध रत्नत्रयमार्ग के प्रति, हे भव्य ! अभक्ति नहीं करना, परन्तु भक्ति कर्तव्य है । (कलश--हरिगीत)
देह-समूहरूपी वृक्ष-पंक्ति से जो भयंकर है, जिसमें दुःख-परम्परारूपी जङ्गली पशु (बसते) हैं, अति कराल कालरूपी अग्नि जहाँ सबका भक्षण करती है, जिसमें बुद्धिरूपी जल (?) सूखता है और जो दर्शन-मोहयुक्त जीवों को अनेक कुनयरूपी मार्गों के कारण अत्यन्त दुर्गम है, उस संसार-अटवीरूपी विकट स्थल में जैन-दर्शन एक ही शरण है ।देहपादपव्यूह से भयप्रद बसें वनचर पशु । कालरूपी अग्नि सबको दहे सूखे बुद्धिजल ॥ अत्यन्त दुर्ग कुनयरूपी मार्ग में भटकन बहुत । इस भयंकर वन विषैं है जैनदर्शन इक शरण ॥३०६॥ तथा - (कलश--हरिगीत)
जिन प्रभु का ज्ञान-शरीर सदा लोकालोक का निकेतन है (जिन नेमिनाथप्रभु के ज्ञान में लोकालोक सदा समाते हैं - ज्ञात होते हैं ), उन श्री नेमिनाथ तीर्थेश्वर का, कि जिन्होंने शंख की ध्वनि से सारी पृथ्वी को कम्पा दिया था उनका, स्तवन करने के लिये तीन-लोक में कौन मनुष्य या देव समर्थ हैं ? (तथापि) उनका स्तवन करने का एकमात्र कारण जिनके प्रति अति उत्सुक भक्ति है ऐसा मैं जानता हूँ ।
सम्पूर्ण पृथ्वी को कंपाया शंखध्वनि से आपने । संपूर्ण लोकालोक है प्रभु निकेतन तन आपका ॥ हे योगि! किस नर देव में क्षमता करे जो स्तवन । अती उत्सुक भक्ति से मैं कर रहा हूँ स्तवन ॥३०७ ॥ |