+ भव्य को शिक्षा -
ईसाभावेण पुणो केई णिंदंति सुंदरं मग्गं ।
तेसिं वयणं सोच्चाऽभत्तिं मा कुणह जिणमग्गे ॥186॥
ईर्षाभावेन पुनः केचिन्निन्दन्ति सुन्दरं मार्गम् ।
तेषां वचनं श्रुत्वा अभक्तिं मा कुरुध्वं जिनमार्गे ॥१८६॥
जो कोइ सुन्दर मार्ग की निन्दा करे मात्सर्य में ।
सुनकर वचन उसके अभक्ति न कीजिये जिनमार्ग में ॥१८६॥
अन्वयार्थ : [पुनः] परन्तु [ईर्षाभावेन] ईर्षाभाव से[केचित्] कोई लोग [सुन्दरं मार्गम्] सुन्दर मार्ग को [निन्दन्ति] निन्दते हैं [तेषां वचनं] उनके वचन [श्रुत्वा] सुनकर [जिनमार्गे] जिनमार्ग के प्रति [अभक्तिं] अभक्ति [मा कुरुध्वम्] नहीं करना ।
Meaning :  If any (persons) find fault with this lovely path (of liberation), simply through malice, then (O disciple) on hearing their words, do not be lacking in devotion to the path of the Conquerors.

  पद्मप्रभमलधारिदेव 

पद्मप्रभमलधारिदेव : संस्कृत
इह हि भव्यस्य शिक्षणमुक्तम् ।
केचन मंदबुद्धयः त्रिकालनिरावरणनित्यानंदैकलक्षणनिर्विकल्पकनिजकारणपरमात्म-तत्त्वसम्यक्श्रद्धानपरिज्ञानानुष्ठानरूपशुद्धरत्नत्रयप्रतिपक्षमिथ्यात्वकर्मोदयसामर्थ्येन मिथ्या-दर्शनज्ञानचारित्रपरायणाः ईर्ष्याभावेन समत्सरपरिणामेन सुन्दरं मार्गं सर्वज्ञवीतरागस्य मार्गं पापक्रियानिवृत्तिलक्षणं भेदोपचाररत्नत्रयात्मकमभेदोपचाररत्नत्रयात्मकं केचिन्निन्दन्ति, तेषां
स्वरूपविकलानां कुहेतुद्रष्टान्तसमन्वितं कुतर्कवचनं श्रुत्वा ह्यभक्तिं जिनेश्वरप्रणीतशुद्ध-रत्नत्रयमार्गे हे भव्य मा कुरुष्व, पुनर्भक्ति : कर्तव्येति ।
(कलश--शार्दूलविक्रीडित)
देहव्यूहमहीजराजिभयदे दुःखावलीश्वापदे
विश्वाशातिकरालकालदहने शुष्यन्मनीयावने ।
नानादुर्णयमार्गदुर्गमतमे द्रङ्मोहिनां देहिनां
जैनं दर्शनमेकमेव शरणं जन्माटवीसंकटे ॥३०६॥

तथा हि -
(कलश--शार्दूलविक्रीडित)
लोकालोकनिकेतनं वपुरदो ज्ञानं च यस्य प्रभो-
स्तं शंखध्वनिकंपिताखिलभुवं श्रीनेमितीर्थेश्वरम् ।
स्तोतुं के भुवनत्रयेऽपि मनुजाः शक्ताः सुरा वा पुनः
जाने तत्स्तवनैककारणमहं भक्ति र्जिनेऽत्युत्सुका ॥३०७॥



यहाँ भव्य को शिक्षा दी है ।

कोई मंदबुद्धि त्रिकाल-निरावरण, नित्य आनन्द जिसका एक लक्षण है ऐसे निर्विकल्प निज कारण-परमात्मतत्त्व के सम्यक्-श्रद्धान-ज्ञान-अनुष्ठानरूप शुद्ध रत्नत्रय से प्रतिपक्ष मिथ्यात्व कर्मोदय के सामर्थ्य द्वारा मिथ्यादर्शन-ज्ञान-चारित्र परायण वर्तते हुए ईर्षा-भाव से अर्थात् मत्सर-युक्त परिणाम से सुन्दर मार्ग को, पाप क्रिया से निवृत्ति जिसका लक्षण है ऐसे भेदोपचार - रत्नत्रयात्मक तथा अभेदोपचार - रत्नत्रयात्मक सर्वज्ञ वीतराग के मार्ग को, निन्दते हैं, उन स्वरूप-विकल (स्वरूप प्राप्ति रहित) जीवों के कुहेतु -कुदृष्टान्त युक्त कुतर्क वचन सुनकर जिनेश्वर प्रणीत शुद्ध रत्नत्रयमार्ग के प्रति, हे भव्य ! अभक्ति नहीं करना, परन्तु भक्ति कर्तव्य है ।

(कलश--हरिगीत)
देहपादपव्यूह से भयप्रद बसें वनचर पशु ।
कालरूपी अग्नि सबको दहे सूखे बुद्धिजल ॥
अत्यन्त दुर्ग कुनयरूपी मार्ग में भटकन बहुत ।
इस भयंकर वन विषैं है जैनदर्शन इक शरण ॥३०६॥
देह-समूहरूपी वृक्ष-पंक्ति से जो भयंकर है, जिसमें दुःख-परम्परारूपी जङ्गली पशु (बसते) हैं, अति कराल कालरूपी अग्नि जहाँ सबका भक्षण करती है, जिसमें बुद्धिरूपी जल (?) सूखता है और जो दर्शन-मोहयुक्त जीवों को अनेक कुनयरूपी मार्गों के कारण अत्यन्त दुर्गम है, उस संसार-अटवीरूपी विकट स्थल में जैन-दर्शन एक ही शरण है ।

तथा -

(कलश--हरिगीत)
सम्पूर्ण पृथ्वी को कंपाया शंखध्वनि से आपने ।
संपूर्ण लोकालोक है प्रभु निकेतन तन आपका ॥
हे योगि! किस नर देव में क्षमता करे जो स्तवन ।
अती उत्सुक भक्ति से मैं कर रहा हूँ स्तवन ॥३०७ ॥
जिन प्रभु का ज्ञान-शरीर सदा लोकालोक का निकेतन है (जिन नेमिनाथप्रभु के ज्ञान में लोकालोक सदा समाते हैं - ज्ञात होते हैं ), उन श्री नेमिनाथ तीर्थेश्वर का, कि जिन्होंने शंख की ध्वनि से सारी पृथ्वी को कम्पा दिया था उनका, स्तवन करने के लिये तीन-लोक में कौन मनुष्य या देव समर्थ हैं ? (तथापि) उनका स्तवन करने का एकमात्र कारण जिनके प्रति अति उत्सुक भक्ति है ऐसा मैं जानता हूँ ।