
हरिहरतुल्लो वि णरो सग्गं गच्छेइ एइ भवकोडी
तह वि ण पावइ सिद्धिं संसारत्थो पुणो भणिदो ॥8॥
हरिहरतुल्योऽपि नर: स्वर्गं गच्छति एति भवकोटि: ।
तथापि न प्राप्नोति सिद्धिं संसारस्थ: पुन: भणित: ॥८॥
सूत्र से हों भ्रष्ट जो वे हरहरी सम क्यों न हों ।
स्वर्गस्थ हों पर कोटि भव अटकत फिरें ना मुक्त हों ॥८॥
अन्वयार्थ : वह [हरिहर] विष्णु और रूद्र [तुल्लोवि] समान [णरो] नर [वि] भी [सग्गं] स्वर्ग तक ही [गच्छेइ] जाता है [भवकोडी] करोड़ों भव धारण कर [संसारत्थो] संसार मे [पुणो भणिदो] बार बार भ्रमण करता है, [तहवि] तथापि [सिद्धिं] मोक्ष [ण] नहीं [पावइ] प्राप्त करता है ।
जचंदछाबडा
जचंदछाबडा :
श्वेताम्बरादिक इसप्रकार कहते हैं कि गृहस्थ आदि वस्त्रसहित को भी मोक्ष होता है, इसप्रकार सूत्र में कहा है, उसका इस गाथा में निषेध का आशय है कि जो हरिहरादिक बड़ी सामर्थ्य के धारक भी हैं तो भी वस्त्रसहित तो मोक्ष नहीं पाते हैं । श्वेताम्बरों ने सूत्र कल्पित बनाये हैं उनमें यह लिखा है सो प्रमाणभूत नहीं है, वे श्वेताम्बर जिनसूत्र के अर्थ पद से च्युत हो गये हैं ऐसा जानना चाहिए ॥८॥
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