
उक्किट्ठसीहचरियं बहुपरियम्मो य गरुयभारो य
जो विहरइ सच्छंदं पावं गच्छदि होदि मिच्छतं ॥9॥
उत्कृष्ट सिंहचरित: बहुपरिकर्मां च गुरुभारश्च ।
य: विहरति स्वच्छन्दं पापं गच्छति भवति मिथ्यात्वम् ॥९॥
सिंह सम उत्कृष्टचर्या हो तपी गुरु भार हो ।
पर हो यदी स्वच्छन्द तो मिथ्यात्व है अर पाप हो ॥९॥
अन्वयार्थ : जो मुनि [सिह] सिंह समान निर्भय होकर [उक्किट्ट] उत्कृष्ट [चरियं] चारित्र का पालन करता है, [बहु] अनेक प्रकार के [परियम्मो] व्रत, उपवासादि करता हैं, [य] तथा [गुरुयभारो य] गुरूभार वहन करता हैं किन्तु [सच्छंदं] जिनसूत्र से च्युत होकर स्वच्छंद [विहरइ] प्रवर्तता है वो [पावं] पाप [गच्छेदि] को प्राप्त होता है, [होदि मिच्छत्तं] मिथ्यादृष्टि होता है ।
जचंदछाबडा
जचंदछाबडा :
जो धर्म का नायकपना लेकर-गुरु बनकर निर्भय हो तपश्चरणादिक से ब़ड़ा कहलाकर अपना सम्प्रदाय चलाता है, जिनसूत्र से च्युत होकर स्वेच्छाचारी प्रवर्तता है तो वह पापी मिथ्यादृष्टि ही है, उसका प्रसंग भी श्रेष्ठ नहीं है ॥९॥
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