+ इच्छाकार के अर्थ को नहीं जान, अन्य धर्म का आचरण से सिद्धि नहीं -
अह पुण अप्पा णिच्छदि धम्माइं करेइ णिरवसेसाइं
तह वि ण पावदि सिद्धिं संसारत्थो पुणो भणिदो ॥15॥
अथ पुन: आत्मानं नेच्छति धर्मान्‌ करोति निरवशेषान्‌ ।
तथापि न प्राप्नोति सिद्धिं संसारस्थ: पुन: भणित: ॥१५॥
जो चाहता नहिं आतमा वह आचरण कुछ भी करे ।
पर सिद्धि को पाता नहीं संसार में भ्रमता रहे ॥१५॥
अन्वयार्थ : [अथ पुण] सो जिसे [अप्पा] आत्मा [णिच्छदि] नहीं इच्छता (आत्मा की भावना नही करता), वह [निरवसेसाइं] बाकी समस्त [धम्माइं करेदि] धार्मिक अनुष्ठान -- दान, पूजादि करता हो, [तहवि] फिर भी [ण पावदि सिद्धिं] सिद्धि नहीं प्राप्त करता, वह [पुणो] फिर [संसारत्थो] संसारी ही [भणिदो] कहा गया है ।

  जचंदछाबडा 

जचंदछाबडा :

इच्छाकार का प्रधान अर्थ आपको चाहना है सो जिसके अपने स्वरूप की रुचिरूप सम्यक्त्व नहीं है, उसके सब मुनि श्रावक की आचरणरूप प्रवृत्ति मोक्ष का कारण नहीं है ॥१५॥