+ इस ही अर्थ को दृढ़ करके उपदेश -
एएण कारणेण य तं अप्पा सद्दहेह तिविहेण
जेण य लहेह मोक्खं तं जाणिज्जह पयत्तेण ॥16॥
एतेन कारणेन च तं आत्मानं श्रद्धत्त त्रिविधेन ।
येन च लभध्वं मोक्षं तं जानीत प्रयत्नेन ॥१६॥
बस इसलिए मन वचन तन से आत्म की आराधना ।
तुम करो जानो यत्न से मिल जाय शिवसुख साधना ॥१६॥
अन्वयार्थ : [एएण] इन इन [कारणेण] कारणों से [य] और [तं] उस [अप्पा] आत्मा का [तिविहेण] मन, वचन, काय से [सद्दहेह] श्रद्धान करो तथा [तं] उसे ही [जाणिज्जइ पयत्तेण] प्रयत्नपूर्वक जानो [जेण] जिससे [लेहह मोक्खं] मोक्ष प्राप्त हो सके ।

  जचंदछाबडा 

जचंदछाबडा :

जिससे मोक्ष पाते हैं, उस ही को जानना, श्रद्धान करना यह प्रधान उपदेश है, अन्य आडम्बर से क्या प्रयोजन ? इसप्रकार जानना ॥१६॥