
चित्तसोहि ण तेसिं ढिल्लं भावं तहा सहावेण
विज्जदि मासा तेसिं इत्थीसु ण संकया झाणा ॥26॥
चित्तशोधि न तेषां शिथिल: भाव: तथा स्वभावेन ।
विद्यते मासा तेषां स्त्रीषु न शङ्कया ध्यानम् ॥२६॥
चित्तशुद्धी नहीं एवं शिथिलभाव स्वभाव से ।
मासिकधरम से चित्त शंकित रहे वंचित ध्यान से ॥२६॥
अन्वयार्थ : [तेसिं] उनके [चित्ता] चित्त की [सोहि] शुद्धता [ण] नहीं है, [तहा] तथा [सहावेण] स्वभाव से [ढिल्लं] शिथिल हैं, [मासातेसिं] प्रत्येक माह [इत्थीसु] स्त्रियों के [विज्जदि] रूधिरस्राव होता है जिससे [ण संकया] निर्भयतापूर्वक उनका [झाणं] ध्यान नहीं होता ।
जचंदछाबडा
जचंदछाबडा :
ध्यान होता है वह चित्त शुद्ध हो, दृढ परिणाम हो, किसी तरह की शंका न हो तब होता है सो स्त्रियों के तीनों ही कारण नहीं हैं, तब ध्यान कैसे हो ? ध्यान के बिना केवलज्ञान कैसे उत्पन्न हो और केवलज्ञान के बिना मोक्ष नहीं है, श्वेताम्बरादिक मोक्ष कहते हैं, वह मिथ्या है ॥२६॥
|