
जचंदछाबडा :
जगत में यह प्रसिद्ध है कि जिनके संतोष है, वे सुखी हैं, इस न्याय से यह सिद्ध हुआ कि जिन मुनियों के इच्छा की निवृत्ति हो गई है, उनके संसार के विषयसंबंधी इच्छा किंचित् मात्र भी नहीं हैं, देह से विरक्त हैं, इसलिए परम संतोषी हैं और आहारादि कुछ ग्रहण योग्य हैं, उनमें से भी अल्प को ग्रहण करते हैं इसलिए वे परम संतोषी हैं, वे परम सुखी हैं, यह जिनसूत्र के श्रद्धान का फल है, अन्य सूत्र में यथार्थ निवृत्ति का प्ररूपण नहीं है इसलिए कल्याण के सुख को चाहनेवालों को जिनसूत्र का निरंतर सेवन करना योग्य है ॥२७॥ ऐसे सूत्रपाहुड को पूर्ण किया । (छप्पय)
(इति पण्डित जयचन्द्र छाबड़ा कृत देशभाषावचनिका के हिन्दी अनुवाद सहित श्रीकुन्दकुन्दस्वामि विरचित सूत्रपाहुड समाप्त)
जिनवर की ध्वनि मेघध्वनिसम मुख तैं गरजे गणधर के श्रुति भूमि वरषि अक्षर पद सरजै ॥ सकल तत्त्व परकास करै जगताप निवारै हेय अहेय विधान लोक नीकै मन धारै ॥ विधि पुण्य पाप अरु लोक की मुनि श्रावक आचरण पुनि करि स्व-पर भेद निर्णय सकल कर्म नाशि शिव लहत मुनि ॥१॥ (दोहा) वर्द्धमान जिनके वचन वरतैं पञ्चमकाल भव्य पाय शिवमग लहै नमूं तास गुणमाल ॥२॥ |