+ सम्यक्त्व से च्युत कब नहीं होता है? -
उच्छाहभावणासंपसंससेवा सुदंसणे सद्धा
ण जहदि जिणसम्मत्तं कुव्वंतो णाणमग्गेण ॥14॥
उत्साहभावना शम्‍प्रशंससेवा: सुदर्शने श्रद्धां ।
न जहाति जिनसम्यक्त्वं कुर्वन्‌ ज्ञानमार्गेण ॥१४॥
सद्ज्ञान सम्यक्भाव की शंसा करे उत्साह से ।
श्रद्धा सुदर्शन में रहे ना बमे सम्यक्भाव को ॥१४॥
अन्वयार्थ : जो [णाणमग्गेण] ज्ञान मार्ग अर्थात सम्यग्ज्ञान द्वारा [सु दंसणे] सम्यग्दृष्टियों गुरुओं की [उच्छाह] उत्साह/रूचि पूर्वक [भावणा] भावना रखता है, [सं] उनकी, [पसंस] प्रशंसा, सेवा और [सद्धा] श्रद्धान करता है वह [जिणसम्मतं] जिनसम्यक्त्व को नही [कुव्वंतो] छोड़ता ।

  जचंदछाबडा 

जचंदछाबडा :

जिनमत में उत्साह, भावना, प्रशंसा, सेवा, श्रद्धा जिसके हो वह सम्यक्त्व से च्युत नहीं होता है ॥१४॥